महानगर का काव्य

ऋषिकेश खोङके "रुह"

Monday, May 21, 2007

मुझे देख कर

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मुझे देख कर, आप मेरे प्रेम मे पड सकते है , खो सकते है मेरी आँखो के समंदर मे | मुझे देख कर, आप मुझे दार्शनिक भी समझ सकते है, मेरे भाव सुकरात ...
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Friday, May 18, 2007

पगडंडी

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पगडंडी हूं मैं पगडंडी, खेतों से इठलाती चली | चने के पौधों को सहलाते, गेहूं के पास से बल खाते, इस छोर से उस छोर, चली मैं मदमदाती चली | कभी ती...
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Monday, May 14, 2007

कांक्रिट का दरख्त

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आखीर वो गिर गया ! फलदार नही था पर छाँव देता था आने जाने वालो को, मैं भी कई बार उस छाँव मे सुस्ताया था | कभी - कभी उसकी सुखी लकडीयां कुछ मजदु...
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Thursday, April 19, 2007

बंदर मामा

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बंदर मामा,बंदर मामा, समझे खुद को सयाना, चने रखे थे कुप्पी मे, चाहता था उसको चुराना | कुप्पी मे हाथ डाल कर, सोचा उसने चने निकालु, एक दो से हो...
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नयनो की भाषा बोलो तुम

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नयनो की भाषा बोलो तुम मूक ये बोली बडी निराली है | शब्द व्यर्थ शोर करते है अर्थ का अनर्थ करते है प्रित की भाषा के फुल यूं खिलने से डरते है सं...
Wednesday, April 18, 2007

सर-पैर

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सर बोला पैर से, तू तुच्छ , मैं महान | पैर बोला कैसे श्रीमान ? सर बोला रे मुरख , तुझे तो कुछ भी न पता है देख मैं कहां शिखर पर, और तू जमीन पर ...
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Tuesday, April 17, 2007

मन मे काफी कुछ बतियाने को है

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मन मे काफी कुछ बतियाने को है दुख-सुख और पिडा बताने को है कोई दिन बचपन के थे सुनहरे , खेला करते थे जब शाम-सवेरे, उम्र का वो पडाव था बडा अनोखा...
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