महानगर का काव्य
ऋषिकेश खोङके "रुह"
Wednesday, August 29, 2007
आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना
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'हिन्द-युग्म' पर 'काव्य-पल्लवन' के अंतरगत प्रकाशित मेरी नयी कविता "आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना" को पढ़ने और उ...
Monday, August 20, 2007
मन बंजारा
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मन बंजारा यहाँ-वहाँ डोल रहा है , सब खिड़की-दरवाज़े खोल रहा है | सीधी रेखा पर चलने की चाह मे , देखा तो धरा पर सब गोल रहा है | जहाँ से चला है व...
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Friday, July 27, 2007
हां ! मैं तन बेचती हूं, तो क्या ?
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मैं तन बेचती हूं ! हां ! मैं तन बेचती हूं, तो क्या ? इस मंडी मे डाल गया था कोई अपना ही , कच्ची कली ही थी तब मै, मुझे तो था कुछ भी पता नही | ...
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Monday, July 23, 2007
अरे रुक जा रे बन्दे
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अरे रुक जा रे बन्दे, वो मर चुका है , वो जल चुका है | अब आग लगाते हो कहाँ, था आशीयाँ जिसका वो गुज़र चुका है | बंद कर ये लहू बहाना, नफरत की फसल...
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Monday, May 21, 2007
मुझे देख कर
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मुझे देख कर, आप मेरे प्रेम मे पड सकते है , खो सकते है मेरी आँखो के समंदर मे | मुझे देख कर, आप मुझे दार्शनिक भी समझ सकते है, मेरे भाव सुकरात ...
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Friday, May 18, 2007
पगडंडी
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पगडंडी हूं मैं पगडंडी, खेतों से इठलाती चली | चने के पौधों को सहलाते, गेहूं के पास से बल खाते, इस छोर से उस छोर, चली मैं मदमदाती चली | कभी ती...
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Monday, May 14, 2007
कांक्रिट का दरख्त
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आखीर वो गिर गया ! फलदार नही था पर छाँव देता था आने जाने वालो को, मैं भी कई बार उस छाँव मे सुस्ताया था | कभी - कभी उसकी सुखी लकडीयां कुछ मजदु...
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