महानगर का काव्य
ऋषिकेश खोङके "रुह"
Wednesday, November 21, 2007
शब्द-यज्ञ की समीक्षा
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'शब्द यज्ञ' परिवेश और प्रकृति की अनुभूतियों को सार्थकता प्रदान करती रचनाएं प्रकृति , परिवेश और अपनी दिनचर्या से जुड़ी सकारात्मक और न...
Tuesday, November 6, 2007
दिप उत्सव
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इस बार कुछ कारणों से दिप उत्सव अकेले ही मनाना पडेगा सो इस बात से मन जरा उदास हो रहा था और अचानक देखा तो मन से कुछ व्यथा बही और शब्दों का आवर...
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Sunday, November 4, 2007
मेरे प्रथम काव्य संग्रह "शब्द यज्ञ" का लोकार्पण समारोह विवरण
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स्नेही मित्रों, दिनांक २६ अक्टूबर २००७ को मेरे प्रथम काव्य संग्रह "शब्द यज्ञ" का लोकार्पण समारोह हिन्दी भवन (महादेवी वर्मा कक्ष) म...
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Sunday, September 30, 2007
मन के हाइकु
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सोचा बहूत , निर्विचार ही रहा उदास मन | हवा से तेज, दौडा मन पखेरु, स्थिर ही रहा | अक्षर झरे, विलोपे रूप सारे, रहा तो मन | रुके ना मन , जल थल ...
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Wednesday, August 29, 2007
आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना
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'हिन्द-युग्म' पर 'काव्य-पल्लवन' के अंतरगत प्रकाशित मेरी नयी कविता "आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना" को पढ़ने और उ...
Monday, August 20, 2007
मन बंजारा
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मन बंजारा यहाँ-वहाँ डोल रहा है , सब खिड़की-दरवाज़े खोल रहा है | सीधी रेखा पर चलने की चाह मे , देखा तो धरा पर सब गोल रहा है | जहाँ से चला है व...
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Friday, July 27, 2007
हां ! मैं तन बेचती हूं, तो क्या ?
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मैं तन बेचती हूं ! हां ! मैं तन बेचती हूं, तो क्या ? इस मंडी मे डाल गया था कोई अपना ही , कच्ची कली ही थी तब मै, मुझे तो था कुछ भी पता नही | ...
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