महानगर का काव्य
ऋषिकेश खोङके "रुह"
Tuesday, November 13, 2018
दिन बचपन के
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वो दिन बचपन के बड़े अनोखे थे | सोते समय दादी नानी की कहानियाँ, जागो तो ढेर सारे खेल थे खिलौने थे | तितली पकड़ने में जाता था दिन सारा, ...
Wednesday, August 19, 2015
****सावन गुज़रा जाता है****
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बादलों के जंगल में शिकारी, जाल बिछा कर पकड़ लो बूंदों के सारे घोड़े । पैरों में नाल ठोक कर, जरा दौड़ाओ, बिजली के कोड़े बरसाओ । सावन ग...
Thursday, October 24, 2013
यूं ही छलक पड़े आसूँ
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यूं ही छलक पड़े आसूँ , न जाने क्यूँ । ढूंढता हूँ , मिलते नहीं माने क्यूँ ॥ कोई सबब नहीं मेरी तन्हाई का । करीब है सब, लेकिन अन्जाने क...
Wednesday, December 8, 2010
कोई दिन
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कोई दिन तो कभी मै खुद पर खर्च करूँ | हर दिन , मिलते ही , टुकड़ों में बंट जाता है , इसके उसके नाम की तख्ती से बंध जाता है , कभी किसी तख्ती...
Monday, February 23, 2009
स्वप्न पिया के -हाइकु
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ब्रम्ह मुहुर्त एक सपना देखा पिया मिलेंगे | सच होंगे क्या देखें हैं जो सपने मैंने तुम्हारे | तुम्हारा साथ सपना है शायद ये तुम्ही तो हो ? नयन ...
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Friday, February 20, 2009
सात रंग
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निला रंग सब स्थिर, शान्त, अव्याकुल और गहरा है, मै देख सकता हूं इनमे दुर तक, ये बातें करता है आकाश पीरोजा आकाश पिला रंग तुम अम्बर हो , तुम हो...
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अनुपमा
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क्या नाम दू मैं तुमको , अपरीचित क्या पारस ! सोना हो गया हूं तुम्हारे छुने भर से क्या प्राण ! जिवन्त हो गया मेरा मृत मन तुमसे क्या वायू ! की ...
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