महानगर का काव्य
ऋषिकेश खोङके "रुह"
Friday, July 14, 2023
हमारी नदियां मर रहीं हैं।
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हमारी नदियां मर रहीं हैं। देखता हूं की पानी की जगह, हमारे ही मल मूत्र से भर रहीं है। दो पीढ़ी पुराने जो बचे हैं लोग, कहते हैं कि, हम कभी नहा...
Friday, July 7, 2023
ग़ज़ल
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बातों में तेरी जायका हरबार अलग है। कुछ तो बात है तुझमें जो यार अलग है।। जख्म नही होता लेकिन दिल में चुभते हैं। ज़ालिम ये तेरी आंखों के औजार ...
Thursday, June 29, 2023
बातें
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मुझे समझ नही आती दिखावटी बातें। चेहरे से लिपटी हुई ये सजावटी बातें ।। फूट ही जानें दो गुबार दिल का अपने। आने दो लब पे थोड़ी बगावती बातें।। ल...
10 comments:
Tuesday, June 27, 2023
शहरों पर मुझको एतबार कोई नही
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शहरों पर मुझको एतबार कोई नही ।। ईंट के मकां लेकिन घरबार कोई नही ।। नकली फूल, नकली पत्ते कैसा गुलिस्तां है। कोई खिजां नही यहां, बहार कोई नही।...
Wednesday, June 7, 2023
ग़ज़ल
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आप बताइये क्या आपकी नज़र करूं । शाम रख दूं सामने या पेश सहर करूं।। यकबयक आप आ गए यूं मेरे सामने । दूर चेहरे से अब कैसे ये नजर करूं ।। दिल तो...
ग़ज़ल
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हुक्मरान भी आजकल डरने लगे है । भले लोगों से कैदखाने भरने लगे हैं।। मुकदमा तुम कर तो रहे हो वाइज। गवाह पर बयानों से मुकरने लगे हैं।। लगता है ...
ग़ज़ल
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ज़िंदगी से मुझे मलाल कुछ नही । हो किसी को मुझे सवाल कुछ नही।। कोई वाइज होगा , आलिम होगा । मैं मलंग मेरी मिसाल कुछ नही।। के मौत आयी और हम मर ...
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