महानगर का काव्य
ऋषिकेश खोङके "रुह"
Wednesday, March 27, 2024
ग़ज़ल
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दिल तुझ से लगाया गुनाह किया। तुझको खुदा बनाया गुनाह किया।। पता न था के हो जाएगा कलम। सजदे सर झुकाया गुनाह किया ।। भूल गया था दाग चांद पर भी ...
Monday, March 4, 2024
अग्नि के अविष्कारक
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अभी पिछले शनिवार किसी चेनल पर कास्ट अवे सिनेमा देखा और उसका एक दृश्य जहाँ नायक अनेक प्रयासो के बाद आग जलाता है , मुझे सोच में डाल गया की आखि...
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Monday, February 5, 2024
मधुशाला से प्रेरित
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एक काव्य पाठ में जहां विषय बच्चन जी की मधुशाला था, कुछ प्रेरित होकर लिखने का प्रयास किया था। अंतस की प्यास बुझाने, भटक रहा है मतवाला। हर द्व...
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प्यार का खत
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प्यार का जब खत पहला लिखा था। नाम उसका मेरी जानां लिखा था।। बयाने दिल काम मुश्किल बड़ा था खत लिखने को सारी रात जगा था लिख लिख कर खत फाड़ें प...
Wednesday, January 31, 2024
कवि की मृत्यु
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सोचता हूं जब मुझ जैसी कवि की मृत्यु आएगी स्वर्ग की ट्रेन, नरक की ट्रेन सवारी कहां की टिकिट पाएगी। बड़े पुण्य किए हों हमने अब ऐसा भी नहीं ह...
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Tuesday, January 30, 2024
मस्जिद में ना वो मंदर मिला (ग़ज़ल)
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मस्जिद में ना वो मंदर मिला। उसे जो ढूंढा वो अंदर मिला।। सच खोजने को गए जहां भी। बस झूठों का समंदर मिला ।। इंसा की बस्ती में दश्त से आए। बड़ा...
Wednesday, January 10, 2024
शह और मात का खेल है (ग़ज़ल)
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शह और मात का खेल है। राजनीति बड़ी चुड़ैल है।। कांधे पर जुआ ज़िंदगी का आदमी कोल्हू का बैल है।। भीड़ ही भीड़ दूर तलक । सब और रेलम पेल है।। अपन...
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