Thursday, April 18, 2024

ग़ज़ल


ग़ज़ल की बह्र: रमल मुसद्दस महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122       2122      212

दर्द  सारा साथ ले कर सो गए।
नैन में बरसात ले कर सो गए।।

छूट जाये ना तिरी नजदीकियां।
हाथ में हम हाथ ले कर सो गए।।

साथ हमने शब  गुज़ारी जाग के ।
ऊँघती फिर रात ले कर सो गए।।

थक गए जब जाग के तो आख़िरश।
मौत की सौगात ले कर सो गए ।।

ग़म भुलाने को लिखे थे रूह जो 
साथ वो नग़मात ले कर सो गए ।।
**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

2 comments: