महानगर का काव्य

ऋषिकेश खोङके "रुह"

Tuesday, February 24, 2026

दुनिया री

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दुनिया री, मुई! डायन लागे मोहे, इसारों पे नाहक, हाकन लागे मोहे । क्या पहनू और कैसा दिखूँ मैं,  कब किसको क्या कैसे कहूँ मैं,  नेरेटिव भईया फि...
Thursday, February 5, 2026

आएगा वक़्त गुज़र जायेंगे

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आएगा वक़्त गुज़र जायेंगे । हम बन के राख बिखर जायेंगे ।। मिट्टी का जिस्म मिले मिट्टी में । ले कर क़्या साथ बशर जायेंगे ।। आईनों से मत सच को पूछ...
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Saturday, December 13, 2025

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ

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मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,  पर कुछ लिख नहीं पा रहा। मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,  कुछ अद्भुत, कुछ अकथ,  जो अव्यक्त, आकाशातीत हो, पर कुछ लिख नहीं प...
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Saturday, November 1, 2025

भीड़ में तन्हा रहता है (ग़ज़ल)

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भीड़ में तन्हा रहता है । ख़ुद से वो उलझा रहता है।। एक समंदर है आँखों में । दिल मगर प्यासा रहता है।। ज़ख़्म जो हो गर सीने में। उम्र-भर ताज़ा र...
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Sunday, October 26, 2025

त्रिवेणी

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(1) तेरे विरह के मोती हैं शायद, ये घास की पलकों पर चमकते, अहसास कुछ गीले लग रहे हैं |
Saturday, September 13, 2025

इवोल्यूशन थ्योरी

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एक दिन सपने में देखा एक सपना, वो जो डार्विन है ना अपना, एक लाल मुंह के बंदर से गप्पे लड़ा रहा था, गप्पे क्या लड़ा रहा था , अपना ज्ञान जबरन उ...
Monday, September 8, 2025

कितना सुंदर लगता हैं (ग़ज़ल)

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कितना सुंदर लगता हैं। कोई पैकर* लगता हैं।। हँस कर बातें करना भी। फूँका मंतर लगता है।। दिल से दिल की दूरी का। ज्यादा अंतर लगता है।। आँखों से ...
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