Friday, March 13, 2026

प्रेम की भाषा

प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता ।
मनोभाव को शब्दों का छद्मावरण नहीं होता ।।

सागर से भी अथाह, हृदय की अनुभूति है, 
अंतस में आकाश से अवतरित श्रुति है,
गीत स्वस्फूर्त स्फुटित होते हैं मुख से,
नयन में निद्रा का कोई आवरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

मृदु समीर स्पंदन है मन के वन में,
अनुबंधन अलक्षित भावों का तन में,
निर्मल प्रेम जहाँ झरता है निश्चल सा
और कोई नियमबद्ध आचरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

कल्पना के कानन में हरसिंगार के फूल,
प्रीत गंध में सुधि-बुधि जाते हैं भूल,
अनियोजित हो जहाँ प्रकृति से भाव ,
तर्कबद्ध मानसिक परिचारण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

4 comments:

Sweta sinha said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सर।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १७ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

Anita said...

वाह!! कितनी गहरी बात, कितने सुंदर शब्दों में

Anonymous said...

भला ढाई आखर का भी कोई व्याकरण हो सकता है! बहुत सुंदर रचना।

विश्वमोहन said...

भला ढाई आखर का भी कोई व्याकरण हो सकता है! बहुत सुंदर रचना।