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Friday, July 3, 2026

मेघा आये रे

घुँघरू बाँध मेघा आये रे ,
छनन छनन गरजाए रे ,
वीना के सुर बोले बीजूरीया ,
पखवाज बदर सुनाए रे।

घुँघरू बाँध मेघा आये रे।

दादुर पोखर शोर मचाये ,
टर्र-टर्र टर्र आलाप लगाए ,
टपटपटप बूंदन की अब तो ,
जियरा मोरा हुलसाए रे।

घुँघरू बाँध मेघा आये रे।

झिमिर-झिमिर ये मंद फुहारें ,
मल्हार गावे सब नगरी द्वारे ,
जलतरंग सुन बरखा की ये ,
अकुलाये मोरी अटरिया रे।

घुँघरू बाँध मेघा आये रे ।

पवन चले मगन, मतवारा,
भीगे पपीहा, वन भी सारा ,
तरकश से तीर इंद्र निकाले,
सप्त रंग जगत दिखलाये रे।

घुँघरू बाँध मेघा आये रे ।

Thursday, April 9, 2026

सांवरिया

ऐसो कैसो रे तू सांवरिया,
खुद आवे ना भैजे पतिया।।

घर छोड़े पिया, बीते बरसों,
भूल गये देस, भूले हमको,
ड्योढी घर की, तोहे पुकारे, 
धूल लथपथ, साँकल द्वारे,
कितनी बाट, तकुं मैं तोरी,
राह तकत, सूजी अखियाँ।।

ऐसो कैसो रे तू सांवरिया।।

सावन मुआ, जियरा जलावे,
सखी हिंडोला, मन ना भावे,
चकोर सी मैं, चंदा निहारूं,
चातकी, पियु-पियु, पुकारूं,
बरस बरस हर दिन ये लागे,
कटे ना काटे ये कारी रतियाँ।।

ऐसो कैसो रे तू सांवरिया।।

सूनी सेज, डसे अँधियारा,
दियाबाती न  करे उजियारा,
चूडी सी टूटे, आस ये मोरी,
पिया अबके आजा होरी?
बैरन भई  ये, ठंडी हवाएं,
ओढ़न चाहूं मैं तोरी बहिया।।

ऐसो कैसो रे तू सांवरिया।।

Saturday, March 28, 2026

कठौती में गंगा

मन चंगा तो कठौती में गंगा,
साधो ये बात हुई पुरानी।
मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

आचमन अब कहाँ सम्भव है, 
इस गंगा, जमना के पानी से।
हालत इन नदियों की अब, 
बेहतर नहीं किसी नाली से ।।
धुलते होंगें पाप कभी ,
अब ये रोग का घर है ज्ञानी।।

मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

नदियों को मइया कहने वाले, 
अब इसमें गटर बहाते हैं।
नदी किनारे कारखाने, 
आँचल में जहर छुपाते हैं।।
अनपढ़ कहूँ मैं, बड़े भले है 
जब शिक्षित करे नादानी।।

मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

कुछ गायब, कुछ कगार पर,
कुछ नदियां अब गटर हुई।
टेम्स नदी के दिवानों को, 
कब देसी नदी की फ़िकर हुई।
योजना बस काग़ज़ पर है, 
और घाटों पर है वीरानी।।

मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

Tuesday, March 10, 2026

साजन तुम नहीं आए

द्वार खड़ी मैं, जुग बीते,
साजन तुम नहीं आए।

भोर भई फिर साँझ ढली,
फूल बनी, कुम्हलाई कली,
चैत्र चला, फागुन भी बीता,
अखियन सूखी जाए।
साजन तुम नहीं आए।।

बांट तकत, सावन सूखा,
सिंगार मन मोरा रूठा,
खनक चूडीयन मौन भई, 
दर्पन नाही देखो जाए।
साजन तुम नहीं आए।।

कोई खबर लाए ना पुरवाई,
अखियां! असूअन! धुँधलाई,
प्रान निकसत जात है मोरे,
पर तन ना छोड़ो जाए।
साजन तुम नहीं आए।।

Wednesday, August 6, 2025

मो से रूठों ना

मो से रूठों ना, मोरे सजनवा।
बिनती करूं मैं , परु चरनवा।।

मुख फेरत तुम, पतझर छाए,
चम्पा चमेली जूही, डार मुरझाए,
सूख गए मेघ मोरी अंखियन के,
निर्दयी खाओ ना कछु तरसवा ।।

बिनती करूं मैं , परु चरनवा।।

द्वारे बैठी मै पलकें बिछाए,
जाने कितने पहर बिताए,
सूरज छत से ड्योढ़ी उतरा,
पर साजन नाही तोरा दरसवा।।

बिनती करूं मैं , परु चरनवा।।

अब तो मोरी आस भी छुटी,
प्रीत प्यार सारी बातें झूठी,
छोर देऊं जो प्रान अगर मैं,
सायद लरजे तोरा करजवा।।

बिनती करूं मैं , परु चरनवा।।

Monday, July 28, 2025

रुत सावन की आई (गीत)

मित्रों **सावन रुत** का पर्दापण हो चुका हैं और ये रुत जैसे रिमझिम वर्षा और हरियाली की द्योतक हैं उसी प्रकार काव्य के संसार में ये **विरह की रुत** मानी जाती हैं जहां प्रकृति न सिर्फ धरा अपितु मन को भी सींचती है और जहां पिया की याद और विरह को भारतीय परिपेक्ष में प्राचीन काल में इस रुत में महिलाओं के पीहर जाने से जोड़ा जाता है।
प्रस्तुत है सावन रुत के विरह  भाव पर मेरी रचना ।

रुत सावन की आई सखी री,
जीयरा लागे अब ना पीहरवा।

पिया नगर से आयो रे उड़के,
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे,
अकुलाया मन पिया को तरसे,
हाल सजन का बताओ बदरवा ।

जीयरा लागे अब ना पीहरवा।

झूला परे सब अमुवा की डारि,
खेलें हिंडोला अब सखियां सारी,
उठत नाही , पग मोरे हुवे भारी,
रह रह मोहे आवे, याद सजनवा।

जीयरा लागे अब ना पीहरवा।

पोखरे भरे सब, बगिया हरियाई,
मोर नाचे और धरिनि इठलाई ,
जीयरा मोरा पर हाय चैन न पाई,
पग पीहर मोरे मन सासुरवा।

जीयरा लागे अब ना पीहरवा।

पगवा छम छम बाजे पैजन,
गीत मलहार सुनावे सावन,
कब तक बाट निहारूँ साजन,
प्रान निकसत जात बिरहवा।

जीयरा लागे अब ना पीहरवा।

Tuesday, June 10, 2025

नटखट कन्हैया

पनिया भरन कूप जाऊं कैसे मईया ।
गगरीया फोर देत नटखट कन्हैया ।।

पनिया भरन कूप जाऊं कैसे मईया ।

भीगी मेरी अंगिया, भीगी मेरी चोली ,
कितना सहूं मुए कान्हा की ठिठोली ,
अखियां दिखाऊं तो और इतराए है,
हाथ उगराऊं तो पकड़ ले बहियां।।

पनिया भरन कूप जाऊं कैसे मईया ।

चरखी बंधी कभू,काट देत पगहा ,
चुटिया खींचें कभू खींचें चुनरवा,
कूद जात कूप कभी लेकर ग्वाले,
बिपदा ही जनमि ये गोकुल नगरिया।

पनिया भरन कूप जाऊं कैसे मईया ।

ठाडे रहें पथ में , घोर उधम मचावे,
कभू मोहे कभू मोरी सखियां सतावे,
काहू जतन माई, कर अपने लला का,
सर फोर दूंगी मैं लेकर लकड़ियां।।

पनिया भरन कूप जाऊं कैसे मईया ।