Saturday, March 28, 2026

कठौती में गंगा

मन चंगा तो कठौती में गंगा,
साधो ये बात हुई पुरानी।
मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

आचमन अब कहाँ सम्भव है, 
इस गंगा, जमना के पानी से।
हालत इन नदियों की अब, 
बेहतर नहीं किसी नाली से ।।
धुलते होंगें पाप कभी ,
अब ये रोग का घर है ज्ञानी।।

मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

नदियों को मइया कहने वाले, 
अब इसमें गटर बहाते हैं।
नदी किनारे कारखाने, 
आँचल में जहर छुपाते हैं।।
अनपढ़ कहूँ मैं, बड़े भले है 
जब शिक्षित करे नादानी।।

मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

कुछ गायब, कुछ कगार पर,
कुछ नदियां अब गटर हुई।
टेम्स नदी के दिवानों को, 
कब देसी नदी की फ़िकर हुई।
योजना बस काग़ज़ पर है, 
और घाटों पर है वीरानी।।

मन तो प्रदुषित पहले ही थे, 
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।

Friday, March 13, 2026

प्रेम की भाषा

प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता ।
मनोभाव को शब्दों का छद्मावरण नहीं होता ।।

सागर से भी अथाह, हृदय की अनुभूति है, 
अंतस में आकाश से अवतरित श्रुति है,
गीत स्वस्फूर्त स्फुटित होते हैं मुख से,
नयन में निद्रा का कोई आवरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

मृदु समीर स्पंदन है मन के वन में,
अनुबंधन अलक्षित भावों का तन में,
निर्मल प्रेम जहाँ झरता है निश्चल सा
और कोई नियमबद्ध आचरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

कल्पना के कानन में हरसिंगार के फूल,
प्रीत गंध में सुधि-बुधि जाते हैं भूल,
अनियोजित हो जहाँ प्रकृति से भाव ,
तर्कबद्ध मानसिक परिचारण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

Tuesday, March 10, 2026

साजन तुम नहीं आए

द्वार खड़ी मैं, जुग बीते,
साजन तुम नहीं आए।

भोर भई फिर साँझ ढली,
फूल बनी, कुम्हलाई कली,
चैत्र चला, फागुन भी बीता,
अखियन सूखी जाए।
साजन तुम नहीं आए।।

बांट तकत, सावन सूखा,
सिंगार मन मोरा रूठा,
खनक चूडीयन मौन भई, 
दर्पन नाही देखो जाए।
साजन तुम नहीं आए।।

कोई खबर लाए ना पुरवाई,
अखियां! असूअन! धुँधलाई,
प्रान निकसत जात है मोरे,
पर तन ना छोड़ो जाए।
साजन तुम नहीं आए।।

Friday, March 6, 2026

चाह है इश्क़

चाह है इश्क़, आह भी है।
ज़िंदगानी तबाह भी है।।

दास्ताँ सब नही सुनहरी।
बारहा ये सियाह भी है।।

ज़ीस्त के पाँव जल रहे हैं।
धूप इसकी गवाह भी है।।

शहर की भीड़ में अकेली।
एक गुमनाम राह भी है।।

रूह खूँटी पे टाँग दो अब।
चाहते जो अथाह भी है।।