सामने वो पहाड़ी,
हरे समंदर में डूबी सी,
नीले आसमान के
जबीं को चूमती,
खड़ी अकेली
लाल मिट्टी से गुजरता रास्ता,
जैसे वक्त की लकीरें हों,
ज़मीन पर उकेरी हुई।l
ज़मी की जुल्फों से
घास के लहराते गेसू,
हवा से बातें करते,
डाकिया बादल,
उम्मीदों के ख़त लिए बहते।
खयालों के मानिंद
आसमान का रंग बदलता,
कभी हल्का, कभी गहरा,
बिन बोले ही सब कहता।
किसी बिछड़े मोड़ पर
पल भर ठहर कर,
एक नज़र डालूं,
शायद ये सफर भी
गुजरी कहानी का हिस्सा हो।
उस पहाड़ी की चोटी पर,
कुछ जवाब मिलेंगे,
या शायद बस सवाल ही
हवाओं में पत्तों से बिखर जाएंग