Saturday, September 14, 2024

वो पहाड़ी

सामने वो पहाड़ी, 
हरे समंदर में डूबी सी, 
नीले आसमान के 
जबीं को चूमती, 
खड़ी अकेली

लाल मिट्टी से गुजरता रास्ता,
जैसे वक्त की लकीरें हों, 
ज़मीन पर उकेरी हुई।l 

ज़मी की जुल्फों से
घास के लहराते गेसू, 
हवा से बातें करते, 
डाकिया बादल, 
उम्मीदों के ख़त लिए बहते।

खयालों के मानिंद 
आसमान का रंग बदलता, 
कभी हल्का, कभी गहरा, 
बिन बोले ही सब कहता।

किसी बिछड़े मोड़ पर 
पल भर ठहर कर, 
एक नज़र डालूं, 
शायद ये सफर भी 
गुजरी कहानी का हिस्सा हो।

उस पहाड़ी की चोटी पर, 
कुछ जवाब मिलेंगे, 
या शायद बस सवाल ही 
हवाओं में पत्तों से बिखर जाएंग

**हिंदी भाषा का उपवन**

हिंदी भाषा का उपवन, विविध बोलियों भरा,  
हर बोली में मिठास, भावों का खज़ाना भरा।  

कविता की क्यारी में, खिले छंदों के फूल,  
राग रागिनीयों भरे, ये गीतों के संकुल 

कहानी की बेलों पर, शब्दों की छाया,  
हर पन्ने पर बिखरी हुई, अनुभवों की माया।  

दोहे, चौपाई, सोरठा, जैसे मोती धरे,  
भक्ति गंगा बहते, मन को निर्मल करें।  

नाटकों के रंग से, रंगती है फुलवारी,  
जीवन की सब सच्चाई, दिखती इसमें सारी। 

हिन्दी साहित्य की शाखें, फैलीं दूर तलक,  
समस्त धरा पर, बिखरी हिंदी की महक।  

गद्य का वृक्ष विशाल, विधा की शाखें अनमोल,
तने पर अंकित, व्याकरण के अनमोल बोल ।

निबंधों की टहनियाँ, परिष्कृत सुविचार,
प्रश्नों के उत्तर में, मिले जीवन की सार।

इतिहास की धरोहर, इसमें होती जीवंत,
भविष्य की राह दिखाते, पुरातन सब ग्रंथ।

संस्मरण की कलियाँ, जो महकती हैं यादों में,
हिंदी की बयार से, लिखी जाती फ़सानों में।

हिंदी का ये उपवन, हमारी संस्कृति का गान,  
अभिव्यक्ति का प्राण, हमारी आन बान शान ।

ऋषिकेश खोड़के "रूह"

Friday, September 13, 2024

गणपती स्तुति

वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभा,  
गौरी पुत्र गणेशाय,कृपा आपकी सर्वदा।  

एकदंत, गजानन, मंगलमय आधार,  
मूषक वाहन सवार, संकट हरें अपार।  

लंबोदर, विकट, विनायक, सिद्धि के हो दाता,  
 वास तुम्हारा रिद्धि संग, सुख-समृद्धि प्रदाता।  

धूम्रवर्ण, भालचंद्र, तुम हो बुद्धि के देव,  
ज्ञान-विवेक से पूरित, कृपा रहे सदैव।

श्री कपिल, विघ्नराज, शुभ कार्य के कर्ता,  
सर्व भय दुख हर्ता , गणपतए विघ्नहर्ता।    

विघ्नेश्वर, गजानन, शुभ-लाभ के तुम दाता,  
मनोकामनाएं पूरी करे, देवाधीश विधाता।  

श्री गणेश, गणाधिपति, संकट हरों हमारे,  
कृपा करो, मंगलमूर्ति, हम भक्त तुम्हारे।  

कृपादृष्टि रखो बना, कहे दास ऋषिकेश,  
नमन श्रीचरण प्रभु, श्रीगणेश, श्रीगणेश।

Wednesday, August 21, 2024

ज़माने की सियासत (ग़ज़ल)

ज़माने की सियासत में, कहाँ इन्सान रहता है।
अमीरी और ग़रीबी में, फसा हैरान रहता है।।

न देखा दर्द दुनिया का, न समझा भूख को अब तक।
हुकूमत के भरोसे पर, वही नादान रहता है।।

सभी  कुछ  है  वहां पैसों  भरा  घर  है  अगर  कोई ।
मगर भूखे के घर में, महज़  इक भगवान रहता है।।

बड़ा मुश्किल है जीना अब, किसी के  साथ रहना भी।
यहाँ हर शख़्स खुद में ही, बहुत वीरान रहता है।।

उठा आवाज़ तू  खुलकर  , बदल दे  दश्त के मंजर।
सियासत की फज़ा में रूह , जो तूफ़ान रहता है।।

Wednesday, June 12, 2024

सौदाई को माने रखते हैं (ग़ज़ल/

सौदाई को माने रखते हैं।
तेरे खत सिरहाने रखते हैं।।

तुम कब आते हो कब जाते हो ।
सारा इल्म दिवाने रखते है।।

कीमत फूल की बढ़ जाए है जब ।
जुल्फों में वो दिखाने रखते है ।।

लब आंखें जुल्फें कितने आखिर ।
सुंदर लोग ख़ज़ाने रखते है ।।

तुझसे मिलने खातिर "रूह"  मियां।
अक्सर अच्छे बहाने रखते है ।।


रचना निम्नलिखित बह्र में है:
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
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