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Monday, September 8, 2025

कितना सुंदर लगता हैं (ग़ज़ल)

कितना सुंदर लगता हैं।
कोई पैकर* लगता हैं।।

हँस कर बातें करना भी।
फूँका मंतर लगता है।।

दिल से दिल की दूरी का।
ज्यादा अंतर लगता है।।

आँखों से जब मय छलके।
क्यूँ फिर साग़र लगता हैं।।

आँगन गोया तीरथ है।।
मज्मा बाहर लगता है।।

भीगे होंठों को छूना।
बिल्कुल शक्कर लगता है।।

सूरत पूजन दिल बैठा।
ये अब काफ़र लगता हैं।।

मह-रुख़ जब छत पर निकले।
बदला मंज़र लगता है।।

दिल की बस्ती गुलशन है।
बाहर बंजर लगता हैं।।

क़तरा क़तरा रोशन है।
बुत पैग़़म्बर लगता है।।

ता'रीफ़ी ग़ज़लें कहना।
सबसे बहतर लगता है।।

लब से बहता इक झरना।
मानो कौसर लगता है।।

रूह-ए-'आलम सोचें तो।
अपना दिलबर लगता है।।

पैकर : शरीर, प्रतिमा, आकृति
साग़र : शराब पीने का गिलास
मह-रुख़ : चाँद-जैसी सूरत वाला
कौसर : स्वर्ग के एक कुंड का पानी 
रूह-ए-'आलम : ब्रह्माण्ड की आत्मा 


Tuesday, September 2, 2025

ज़िंदगी मुश्किल सफ़र है (ग़ज़ल)

ज़िंदगी मुश्किल सफ़र है।
ढूंढना मंज़िल सफ़र है।।

गर तलाश-ए-हक़ इरादा।
फिर सफ़र काबिल सफ़र है।।

दास्ताँ जो राह कहती ।
बस वहीं हासिल सफ़र है।।

चाँद के साथी सितारे।
रात का झिलमिल सफ़र है।

रूह बंजारा है उसके।
भाग में शामिल सफ़र है।।


बह्र:
रमल मुरब्बा सालिम
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन


Saturday, August 30, 2025

दिल लगाना (ग़ज़ल)

दिल लगाना नहीं मुझको,
कुछ गँवाना नहीं मुझको।

चाक मेरा गिरेबाँ है,
पर दिखाना नहीं मुझको।

राग दीपक सुनाता हूँ,
अब बुझाना नहीं मुझको।

एक महब्बत अधूरी सी,
फिर निभाना नहीं मुझको।

आँख नम, गाल गीले हैं,
पर छुपाना नहीं मुझको।

बस छुपाने कसक अपनी,
मुस्कुराना नहीं मुझको।

धूप है "रूह" दामन में,
छाँव पाना नहीं मुझको।

बह्र: फ़ाएलातुन मुफ़ाईलुन
रदीफ़: नहीं मुझको
क़ाफ़िया: …आना

Saturday, July 26, 2025

बस इक ख़ज़ाना चाहिए (ग़ज़ल)

बस इक ख़ज़ाना चाहिए।
दिल में ठिकाना चाहिए।।

तन्हा बहलता दिल नहीं ।
कोई फ़साना चाहिए।।

ग़म राग जैसे भैरवी ।
गा कर सुनाना चाहिए।।

आँसू मिरे बहते जहाँ।
तीरथ बनाना चाहिए ।।

ख़त की सियाही खून थी।
उसको बताना चाहिए ।।

अल्फ़ाज़ बैठे रूठ कर।
अब दिल लगाना चाहिए।।

यह "रूह" के अश'आर है।
सबको पढ़ाना चाहिए।।

Wednesday, July 2, 2025

दुआओं में असर (ग़ज़ल)

ये दुआओं में असर होता हैं क्या ।
देखते हैं मांग कर होता हैं क्या ।।

रात काटी जाग कर, बेकल रहा ।
कुछ नहीं दिल को ख़बर होता है क्या।।

भूलना उसको तिरे बस में नहीं ।
ढूँढ ऐसा भी हुनर होता है क्या ।।

अश्क भी तो ज़हर है, बहता हुआ।
देखिए इसका असर होता है क्या।।

लब जले, साँसें जलीं, दिल भी जला ।
ख़ाक होने से मगर होता है क्या ।।

चांद लगता है, कभी सूरज लगे।
टोटका शाम ओ सहर होता हैं क्या।।

‘रूह’ साहब अब नहीं मुमकिन सुख़न।
लफ़्ज़ नाख़ुश तो असर होता है क्या ।।

Wednesday, June 4, 2025

ज़िंदगी (ग़ज़ल)

जिंदगी तू कमाल  है ।  
तोहफा बेमिसाल है ।।  

खुद से खफा हों किसलिए ।  
हर घड़ी ये सवाल है ।।  
  
ठोकरें लाख राह  में  
रोक सकें मजाल  है ।।  
  
जीत पड़ाव आख़िरी ।  
हार तो एक  ख्याल है।।  
  
जिस्म को रूह छोड़ कर ।
जाए कहां सवाल है ।।

Saturday, May 31, 2025

इतना हत-बल किसलिये (ग़ज़ल)

इतना हत-बल किसलिये।
सत्य निर्बल किसलिये?

धर्म धंधा हो चुका ।
अब गंगा जल किसलिए?

कर्म तो बे मोल हैं ।
जात पर बल किसलिए?

भीख में हक़ मांगते।
लोक दुर्बल किसलिए?

एक सोफा चाहिये।
और जंगल किसलिए?

खेत में सीमेंट जब ।
हाथ में हल किसलिए?

सच अगर क़ाबिल नहीं।
रूह पागल किसलिए?

Saturday, May 24, 2025

कुछ गलत कुछ सही है (ग़ज़ल)

कुछ गलत, कुछ सही है ।
जिंदगी तो यही है ।।

दंभ की भीत देखो ।
बीच रिश्ते खड़ी है ।।

चीख़ गूँगों की सुनिए।
वेदना से भरी है।।

गाँव की देहरी भी अब ।
शहर से आ मिली है।।

रूह’ सच बोलने पर ।
क्रोध घृणा सही है ।।

Wednesday, April 30, 2025

दिल लगाने का (ग़ज़ल)

दिल लगाने का इनआम देना पड़ा।
अपने अहसास को नाम देना पड़ा।।

थरथराई ज़बां, लड़खड़ा भी गई ।
आँख को होंठ का काम  देना पड़ा ।।

हसरतों की तपिश में जले हम बहुत।
फिर हवाओं को इल्ज़ाम देना पड़ा।।

जब लिपटती रही धूप सी हिज्र की
वस्ल की छाँव को काम देना पड़ा।।

मैं जिसे रात सारी रहा ढूँढता ।
ख़्वाब में उसको आराम देना पड़ा।।

तितलियाँ रंग सारा गई लूट कर ।
बाग को खुद ही गुलफाम देना पड़ा।।

"रूह" काग़ज़ पे जज़्बात लिखता रहा ।
दास्ताँ को ग़ज़ल नाम देना पड़ा।।

Thursday, March 27, 2025

बस जिक्र तिरा

बस जिक्र तिरा ही रूहानी है ।।
बाकी दुनिया में सब फ़ानी हैं ।।

जादू तेरी आँखों का  तौबा ।
भूला की पलकें झपकानी है ।।

तेरी यादें हैं गोया जुगनू ।
रातें  मेरी सारी नूरानी है ।।

तुझसे मिलना दीवाली जैसा।
बिछड़े तो लगता वीरानी है।।

तेरी महफ़िल में रूह की बातें।
दुनिया में सबको हैरानी है।।

Friday, January 24, 2025

उम्मीदों का बोझ (ग़ज़ल)

उम्मीदों का बोझ उठा कर खड़े रहे।
कंधों को ता-'उम्र झुका कर खड़े रहे।।

खुश रहने का फ़न मालूम नहीं उनको
मुखड़ा जो बेकार फुला कर खड़े रहे।।

आँधी तूफ़ानों ने घेरा है जब भी ।
अपना हम भी पैर जमा कर खड़े रहे।।

तन्हा सा दुनिया की जब भीड़ में लगा ।
आईना सामने लगाकर खड़े रहे ।।

अपना दुख क्या "रूह" ज़माने को कहते ।
बस अपने दिल को समझा कर खड़े रहे।।

Wednesday, October 30, 2024

दिल के सहरा में (ग़ज़ल)

दिल के सहरा में तू बारिश  कर दे।
बस पूरी इक मेरी ख्वाइश कर दे।।
दर्द-ए-दिल बह जायेगा आँखों से ।
डर है कोई ना फरमाइश कर दे।।
आमादा हूं खाने को हर धोखा ।
गर चाहे तो कोई साज़िश कर दे।।
कह ना पाया मैं लफ़्ज़ों में तुमसे ।
फ़रमाइश पूरी वो दानिश कर दे।।
जी में जी आ जायेगा चारागर।
अपनी आँखों में तू जुंबिश कर दे।। 
रूह-ए-आलम बन के जो बिखरा है ।
छू ले जिसको उसको ताबिश कर दे।।

तेरा मेरा ख़ुदा (ग़ज़ल)

गुल पत्ते ये हवा अलग कैसे है ।
तेरा मेरा ख़ुदा अलग कैसे है ।।
है इक ही रंग लाल, सबके ख़ूँ  का।
हम सारे फिर बता अलग कैसे है ।।
नदियां नाले सभी फ़ना दरिया में ।
अपना फिर रास्ता अलग कैसे है।।
ढलते ही शाम घर दिया जलता है 
कह दे ना ये दुआ अलग कैसे है।
इक मंजिल रूह अलहदा हैं राहें।
फ़िरकों का राब्ता अलग कैसे है।।

Sunday, October 27, 2024

ग़म न इतना सहा कर (ग़ज़ल)

ग़म न इतना सहा कर ।
बात दिल की कहा कर ।।
धड़कनों की कहानी ।
लफ़्ज़ बन के कहा कर।।
ख़्वाब तो फूल हैं बस ।
खाद पानी किया कर।।
ज़िन्दगी इक सफ़र है ।
मुस्कुरा के चला कर।।
अश्क अपने छुपा कर।
होंठ से तब्सिरा कर।।
आँख में ख़्वाब अपने ।
उम्र भर रख सजा कर।।
आरसी सच न कह दे।
हौसला रख बना कर।।
क्यों उदासी में जीना।
मन करे तो हँसा कर।।
जो नहीं साथ तेरे ।
राह उनसे जुदा कर।।
फ़ासिला बढ़ न जाए।
पास दिल के रहा कर।।
तीरगी ख़त्म करने ।
रौशनी से मिला कर।।
बोझ कर दिल का हल्का ।
अश्क अपने बहा कर।।
रूह का हम-सफ़र तू ।
साथ उसके चला  कर ।।

Tuesday, October 15, 2024

इतना भी ना रुला मुझे (ग़ज़ल)

इतना भी ना रुला मुझे,
अश्क दे ना बहा मुझे।
हर ख़ता की सज़ा कुबूल ,
अर्ज़ न तू भुला मुझे।
दर्द बढ़े दवा लगे,
हो सके तो सता मुझे।
बात न जो कही गईं ,
बोल बता सुना मुझे।
"रूह" का आख़िरी सफ़र,
आग़ लगा जला मुझे।

Tuesday, October 8, 2024

मैं ही मेरे जैसा (**ग़ज़ल**)

मैं ही मेरे जैसा और ना कोई ।
ऐसा वैसा कैसा और ना कोई ।।

ग़म के बादल भी सूखे आँखों में । 
बूँदों को यूं तरसा और ना कोई ।।

दिल की बातें कैसे कह दूँ, सबसे ।
गहरा रिश्ता ऐसा, और ना कोई ।।

हाथों की रेखा में उलझा रहता ।
शायद इंसाँ जैसा और ना कोई ।।

अपनी ख़ुश्बू जब बाँटी उससे तो ।
यूँ महका वो जैसा, और ना कोई ।।

उसके ग़म में टूटा हद से ज़्यादा ।
चुप है जैसे गूँगा, और ना कोई ।।

उसके चेहरे पर मत होना आशिक़ ।
उसके जैसा छलिया और ना कोई ।।

यादों का शो'ला है दिल के अंदर ।
मेरे दिल सा जलता और ना कोई ।।

सब कुछ जाने अपने बारे में "रूह"।
खुद को इतना समझा, और ना कोई ।।

**ऋषिकेश खोडके "रूह"**
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Wednesday, October 2, 2024

ग़म की बात चले (ग़ज़ल)

किसी से आंख मिलाओ कि ग़म की बात चले ।
जिगर में आग जलाओ कि ग़म की बात चले ।।

कहाँ अकेला वो बैठा है तीरगी ओढ़े ।
उसे चराग़ दिखाओ कि ग़म की बात चले ।।

तमाम उम्र सुलगती है हिज्र की सिगड़ी ।
धुआं जरा सा उड़ाओ कि ग़म की बात चले ।।

कभी सुकून मिला है कहीं दिल-ए-मुर्दा ।
सुकूँ पे ख़ाक उड़ाओ कि ग़म की बात चले।।

अगर बयान करे "रूह" हाल सब दिल का ।
ज़रा उन्हें भी बताओ कि ग़म की बात चले।।