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Saturday, August 1, 2026

धीमी आँच

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो,
सुख-दुख के मसाले सारे घुलने दो।
नेह की हाँडी जब महक उठे,
वक़्त की कलछी धीरे चलने दो।

मिट्टी के चूल्हे-सी सुलगें साँसें,
लकड़ी-सी ख़ामोशी धीरे जले।
यादों का सिल-बट्टा बोल उठे,
बातों की चटनी तब अच्छी लगे।
नमक ज़रा बस चुटकी भर हो,
गुड़-सी हँसी को जरा घुलने दो।

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।

धीरज से गूँथो सपनों का आटा,
उम्मीदों की रोटी फूलने दो।
माफ़ी का घी टपके तवे पर,
अहम् का धुआँ निकलने दो।
प्यार का छौंक ज़रा-सा देना,
जीवन की दाल महकने दो।

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।

दम पर रखना रूठे मिज़ाज,
ढक्कन से न भाप निकलने दो।
कठोर मन जब ख़स्ता हो जाए,
खुशबू को फिर पसरने दो।
जब पक जाए हर इक निवाला,
चुपके से आँखों को चखने दो।

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।

चूल्हे की लौ का धर्म यही है,
नेह की रसोई यही सिखाती।
कच्चे चावल, कच्चे रिश्ते—
धीमी आँच भरोसा पकाती।
उम्र लगे तो लगने देना,
ज़ायका उम्र-भर रहने दो।

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।

Thursday, July 2, 2026

नेता हूँ मैं

बिन पेंदी का लोटा हूँ मैं, 
सही पहचाने, नेता हूँ मैं।

चरैवेति मंत्र मानता हूँ, 
स्व लाभ पहचानता हूँ,
गधा कितना भी हो गधा,
वक़्त पडे, बाप मानता हूँ।
मक्कारी भरी है खून में, 
सच्चा कलयुगी बेटा हूं मैं।

सही पहचाने, नेता हूँ मैं।

वादों की खेती करता हूँ,
सपने आँखों में भरता हूँ,
कुर्सी देख मैं गिरगिट सा,
अपना रंग बदलता हूँ।
सिद्धांत बेच के मंडी में,
नोट करारे लेता हूँ मैं।

सही पहचाने, नेता हूँ मैं।

जनता का तबतक मान है,
जब तक देश में मतदान है,
जीत गये तो पाँच बरस तक,
अपुनच साला भगवान है।
फिर बिसात क्या जनता की है,
मंदिर को भी ठग लेता हूं मैं।

सही पहचाने, नेता हूँ मैं।

दल बदलने को नीति कहूँ,
टिक जाने को प्रीति कहूँ,
सत्ता जिस करवट बैठी हो,
उस करवट की रीति कहूँ।
आराधक हूँ, अवसर का,
पलटी खाने को बैठा हूँ मैं।

सही पहचाने, नेता हूँ मैं

कुर्सी ही मेरा धर्म ग्रंथ है, 
कुर्सी ही मेरा जाती पंथ है, 
कुर्सी मेरी पूजा-अर्चना,
कुर्सी ही मेरा आदि अंत है।
कुर्सी हो तो, हूं मैं कलियुग,
अन्यथा फिर त्रेता हूं मैं ।

सही पहचाने, नेता हूँ मैं।

Friday, March 13, 2026

प्रेम की भाषा

प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता ।
मनोभाव को शब्दों का छद्मावरण नहीं होता ।।

सागर से भी अथाह, हृदय की अनुभूति है, 
अंतस में आकाश से अवतरित श्रुति है,
गीत स्वस्फूर्त स्फुटित होते हैं मुख से,
नयन में निद्रा का कोई आवरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

मृदु समीर स्पंदन है मन के वन में,
अनुबंधन अलक्षित भावों का तन में,
निर्मल प्रेम जहाँ झरता है निश्चल सा
और कोई नियमबद्ध आचरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

कल्पना के कानन में हरसिंगार के फूल,
प्रीत गंध में सुधि-बुधि जाते हैं भूल,
अनियोजित हो जहाँ प्रकृति से भाव ,
तर्कबद्ध मानसिक परिचारण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।

Saturday, December 13, 2025

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ, 
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ, 
कुछ अद्भुत, कुछ अकथ, 
जो अव्यक्त, आकाशातीत हो,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ, 
ऐसा जो समाज झिंझोड दे,
खोल दे सब शर्मनाक परते,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ, 
सब अच्छा जो पीछे छुटा,
सब बुरा जो साथ चल रहा, 
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ, 
वो जो सदियों जिवंत रहे, 
जो मुझे सदियों जिवंत रखे 
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जो मौन का स्पन्दन हो,
शब्दों से पहले जो बोले,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
आंसुओं की सुर्ख स्याही से,
गालों पर लिखी कविता सा,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जो भीड़ में हो सच सा खड़ा,
जो जुल्म से आँख मिला सके,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जो आत्मा तक हो नग्न,
ना कोई छल, ना कोई कपट,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जो सुप्त मन करे आंदोलित,
जो प्रश्नों के दीप जला दे,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
शब्द जहां क्षितिज छू लें,
भाव जहां विलीन हो जाएं,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जहाँ शब्द अर्थ त्याग दें,
जहाँ अर्थ विसर्जित हो जाए,
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
पर शायद ये अ-लेखन ही 
सम्भवतः सर्वोच्च रचना हो 
जो लिखी जा नहीं पा रही।

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ, 
पर कुछ लिख नहीं पा रहा।

Friday, May 30, 2025

शब्द

 भावना मेरी  
शब्दों के सहयोग से,
अभिव्यक्त होती हैं जब,
कविता हो जाती ।

कोई शब्द 
अश्रु हो जाता है,
शब्द कोई कभी 
हृदय का स्पंदन।

कभी कभी शब्द 
विलाप भी हो जाते हैं।
शब्द कभी कभी,
अट्टहास का रूप धरते हैं।

शब्द कोमल रूप में,
अद्भुत ममता में ढल जाते हैं।
शब्द हर जिम्मेदारी लिए 
आदर्श पिता बन जाते हैं।

शब्द कभी होते हैं माध्यम 
चंद्र रूपणी नायिका।
शब्द बहुधा प्रेमिका के 
मृगनयन की माया दिखाते हैं।

शब्द दर्पण भी हैं ,
स्वयं का सत्य दर्शाते हैं।
शब्द शंखनाद भी हैं,
उद्घाटित करते हैं अंतर के स्वर।

शब्द अतंर में उद्घाटित,
ध्वनि हैं ध्यान की , शून्य की।
शब्द पवित्र अनुगूंज भांति,
रचयिता नाद ब्रम्ह हो जाते हैं।

शब्द चेतना जगाती,
गुरुमुख वाणी हैं,
शब्द अनादि काल से,
निर्वाण है समाधि है ।

शब्द मुखौटा हैं 
विरह, वेदना, विलाप,
प्रेम, प्रीत, प्रमोद,
माया, ममता, मां,
हर रूप का,। 
बस विचार करें ।

शब्द!
हां शब्द!
संचय कर के रखिए।
वैसे ही जैसे रखते थे ऋषि 
क्योंकि,
शब्द अद्भुत होते हैं ,
शब्द मात्र अर्थ नहीं ,
बहुधा अर्थात भी होते है ।

Sunday, December 15, 2024

गंध

शब्द! 
मात्र गंध होते हैं,
हृदय में उपजती अनुभूतियों की गंध।

ये गंध,
सुगंध है की दुर्गंध?
अवलंबित है इस पर की 
किसी परिस्थिति विशेष में,
आपके हृदय की भावनाएं क्या है,
वो कौन सी अनुभूति है
जो मुझको, तुमको नियंत्रित करती हैं 
क्या ये भावनाएं 
किसी मीर या किसी निराला के उद्यान से है 
या फिर किसी विक्षिप्त के 
नराधम सड़े हुए मस्तिष्क की कुंठा के बांसी अवशेष।

हर परिस्थिति में 
शब्द व्यक्त हो जाते है 
गंध बन कर बिखर जाते है 

मैने भी अनेकों बार 
अपनी अनुभूति के शब्दों की गंध
सहेजी है कविता का इत्र बना कर
और ये मेरी कविता ,
मात्र सूचीपत्र है 
मेरी उन सारी कविताओं का,
जो पन्नों से उड़ कर 
अपनी गंध फैलाने को तत्पर है।

कभी समय मिले तो
मेरी कविताओं के इत्र की गंध सूंघे जरूर,
गंध! 
सुगंध है कि दुर्गंध 
ये मैं आप पर छोड़ता हूं।

Saturday, September 14, 2024

**हिंदी भाषा का उपवन**

हिंदी भाषा का उपवन, विविध बोलियों भरा,  
हर बोली में मिठास, भावों का खज़ाना भरा।  

कविता की क्यारी में, खिले छंदों के फूल,  
राग रागिनीयों भरे, ये गीतों के संकुल 

कहानी की बेलों पर, शब्दों की छाया,  
हर पन्ने पर बिखरी हुई, अनुभवों की माया।  

दोहे, चौपाई, सोरठा, जैसे मोती धरे,  
भक्ति गंगा बहते, मन को निर्मल करें।  

नाटकों के रंग से, रंगती है फुलवारी,  
जीवन की सब सच्चाई, दिखती इसमें सारी। 

हिन्दी साहित्य की शाखें, फैलीं दूर तलक,  
समस्त धरा पर, बिखरी हिंदी की महक।  

गद्य का वृक्ष विशाल, विधा की शाखें अनमोल,
तने पर अंकित, व्याकरण के अनमोल बोल ।

निबंधों की टहनियाँ, परिष्कृत सुविचार,
प्रश्नों के उत्तर में, मिले जीवन की सार।

इतिहास की धरोहर, इसमें होती जीवंत,
भविष्य की राह दिखाते, पुरातन सब ग्रंथ।

संस्मरण की कलियाँ, जो महकती हैं यादों में,
हिंदी की बयार से, लिखी जाती फ़सानों में।

हिंदी का ये उपवन, हमारी संस्कृति का गान,  
अभिव्यक्ति का प्राण, हमारी आन बान शान ।

ऋषिकेश खोड़के "रूह"

Thursday, May 9, 2024

राजनीति

कहीं ईट कहीं रोड़ा जोड़ना है राजनीति ।
इसे पकड़ना उसे छोड़ना है राजनीति।।
साम दाम दंड भेद, येन केन प्रकरेण।
विरोधियों का होसला तोड़ना है राजनीति।।
हाथ जोड़े तो भी मिलों न जिससे साल भर।
चुनाव में उसके हाथ जोड़ना है राजनीति ।।
जो दिख रहे हैं वही तो कह रही है कविता।
भावनाओं का तोड़ना मरोड़ना है राजनीति।।

Sunday, May 5, 2024

छांव

आज जांभळी गांव से जूना महाबलेश्वर ट्रैक के दौरान कड़ी धूप में बीच बीच मे छांव के मिलने पर मेरी कविता

शहरों में धीमी मौत मर रही हैं छांव ।
जंगल में आराम कर रही हैं छांव ।।
ऊंचे ऊंचे दरख्तों के बीच  मे से।
कभी धूप, कभी बिखर रही हैं छांव ।।
बल खाती  जंगल की पगडंडियों से ।
घूमते टहलते उतर रही है छांव।।

**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

Friday, July 14, 2023

हमारी नदियां मर रहीं हैं।

हमारी नदियां मर रहीं हैं।
देखता हूं की पानी की जगह,
हमारे ही मल मूत्र से भर रहीं है।

दो पीढ़ी पुराने जो बचे हैं लोग,
कहते हैं कि,
हम कभी नहाते थे इन नदियों में,
प्यास भी इसी पानी से बुझा लेते थे।
पास के गांव की महिलाए,
घड़ों में भर के ले जाती थी पानी।
मछुआरे जाल डाल कर,
कतला, रोहू, सिंघाल पकड़ा करते थे,
झींगा, केकड़ा
तो बच्चे भी पकड़ ले जाया करते थे अक्सर।

एक दादाजी कहते हैं,
नाव में कई बार आते थे वो दादी के साथ,
और घंटो नाव पर सिंघाड़े खाते हुवे बिताते थे,
रोमांटिक डेट कह लो आज के हिसाब से।

पिछली पीढ़ी वाले भी कहते हैं,
कुछ साल तो वो भी नदी मैं खेलें है,

फिर क्या हूवा पता नही,
अचानक आधुनिकता की बयार चली,
कंक्रीट के जंगल बढ़ते चले गए,
और भूख इतनी बढ़ी की,
की हम नदियों के किनारे भी खा गए,
नदी में उतरने वाली,
नालों, झरनों की पगडंडियों खो गई !
बदले में हमने ड्रेनेज पाइप उतार दिए,
नदी की छाती पर।

और अब !

अब 
हमारी नदियां मर रहीं हैं।
देखता हूं की पानी की जगह,
हमारे ही मल मूत्र से भर रहीं है,
इंसानों के क्या ही कहने,
मछलियां भी अब,
अपनी ही नदी में
उतरने से डर रही है।

हमारी नदियां मर रहीं हैं।