धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो,
सुख-दुख के मसाले सारे घुलने दो।
नेह की हाँडी जब महक उठे,
वक़्त की कलछी धीरे चलने दो।
मिट्टी के चूल्हे-सी सुलगें साँसें,
लकड़ी-सी ख़ामोशी धीरे जले।
यादों का सिल-बट्टा बोल उठे,
बातों की चटनी तब अच्छी लगे।
नमक ज़रा बस चुटकी भर हो,
गुड़-सी हँसी को जरा घुलने दो।
धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।
धीरज से गूँथो सपनों का आटा,
उम्मीदों की रोटी फूलने दो।
माफ़ी का घी टपके तवे पर,
अहम् का धुआँ निकलने दो।
प्यार का छौंक ज़रा-सा देना,
जीवन की दाल महकने दो।
धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।
दम पर रखना रूठे मिज़ाज,
ढक्कन से न भाप निकलने दो।
कठोर मन जब ख़स्ता हो जाए,
खुशबू को फिर पसरने दो।
जब पक जाए हर इक निवाला,
चुपके से आँखों को चखने दो।
धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।
चूल्हे की लौ का धर्म यही है,
नेह की रसोई यही सिखाती।
कच्चे चावल, कच्चे रिश्ते—
धीमी आँच भरोसा पकाती।
उम्र लगे तो लगने देना,
ज़ायका उम्र-भर रहने दो।
धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।
No comments:
Post a Comment