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Friday, April 4, 2025

जइयो नाहीं ओ घनश्याम रे (गीत)

जइयो नाहीं ओ घनश्याम रे, जइयो नाहीं
मोरे नैना तोका निहारते, जइयो नाहीं।।


हम घूँघट उठावें के मुख तोरा प्रान भयो,
प्रीत लागी ऐसी, हियरा भी जान गयो।
लाज की रेखा जोबन लांघ गयो राम रे।
जइयो नाहीं ओ घनश्याम रे, जइयो नाहीं


बंसी की तान तोरी, सुध बिसराय,
काम काज भुलायो, दईया सब हाय।
चित चपला बंसी तोरी रसधाम रे।
जइयो नाहीं ओ घनश्याम रे, जइयो नाहीं।


चरणन की धूलि हम मांग भर लीन्ह,
खुद को तोरी अर्धभागीनी कर लीन्ह।
तो बिनु नाहीं हमारो कोऊ ठाम रे।
जइयो नाहीं ओ घनश्याम रे, जइयो नाहीं।


गागरियन फोडन पनघट पधारों,
आवन की बाट जोहै मनवा हमारो,
फोड़ौ इन गगरियन, रख्यौ सिर पै थाम रे।
जइयो नाहीं ओ घनश्याम रे, जइयो नाहीं।

Wednesday, March 12, 2025

होरी

होरी में छलिया छल कर गयो,
गुलाल अबीर हमे रंग कर गयो...
हम तो भिगोने की सोचत रहे,
 हमको ही कान्हा तर कर गयो...

होरी में छलिया छल कर गयो....

पिचकारी मारि के, तन भिगायों,
अबीर गुलाल मोहे मोहन लगायो...
हम सखियां सोचे कान्हा रंग लगावैं,
नटखट पर हाथन  छिटक कर गयो।

होरी में छलिया छल कर गयो....

होद में डारै की ठानी सबने,
राधा गोपि खींचे लाई, किसन ने,
पर छलिया प्रपंच सारा बुझ गयो,
खुद हमका होद गिराय कर गयो...

होरी में छलिया छल कर गयो....

हम रोवत बईठे संग सखिन के,
 नंदकिशोर तब बोलै हंसि के
होरी खेलें चलो सबै मिलन के 
प्रेम से रंगीलो सराबोर कर गयो...

होरी में छलिया छल कर गयो....

Friday, October 25, 2024

हिंडोला

हिंडोला झूलत मोरे आँगनवा, 
मनवा हमार ललचाय ।
चल री सखी झूलन को झूला 
पुरवा ये खींच बुलाय।।

बैठ जइबे संग तुम्हरे सखी,
झूलब हम भी सनन-सनन।
गगन छुअत ज्यों हिंडोला ,
बढ़त जाय सखी धरकन ।
देख सखी नटखट ये पुरवा,
हाथन लट सहलाए।
हिंडोला झूलत मोरे आँगनवा, 
मनवा हमार ललचाय ।

संग संग यूं झूलत झूलत,
गाएं हम कजरी गीत ।
सरर सर काट पबन को,
रस्सी झूले की दे संगीत।
पकड़ रख पर हाय दईया,
लहंगा हमारवा लहराय ।
हिंडोला झूलत मोरे आँगनवा, 
मनवा हमार ललचाय ।

ए सखी! रस्सा रख पकड़े,
जोर लगाईं हम दोउ पारे।
गगन तक उड़ावें झोंका,
चल पगवा पंख लगा ले ।
छू कर आवे चल सूरजवा ,
मनवा खूब ललचाय।
हिंडोला झूलत मोरे आँगनवा, 
मनवा हमार ललचाय ।

Saturday, September 21, 2024

मर जाऊं तो मत रोना

मर जाऊं तो मत रोना, मेरे गीत कविता गा देना,
यादें मेरी औढ़ के तुम, इक दुनिया नई बसा लेना।

मस्ती में जो हंसता हूं, जोश में आके बहकता हूं,
हर गली, हर राह में, मैं झूमता हूं, उछलता हूं।
याद करना इस पल को, जब नही मैं संभलता हूं,
इन रंगों में मेरी मस्ती का इक रंग लगा देना।

मर जाऊं तो मत रोना, मेरे गीत कविता गा देना।

नज़्मों में जो लिखता हूं, मैं गीतों में जो ढूंढता हूं,
ग़ज़ल के हर शेर में , मै अपना जहाँ बुनता हूं।
किताबों में खो जाता हुं, सपनों में उड़ जाता हूं,
तुम भी मेरे लफ़्ज़ों में, ये रूह मेरी पा लेना।

मर जाऊं तो मत रोना, मेरे गीत कविता गा देना।

वो जंगल वो पर्वत, जहाँ मैं खो सा जाता हूं,
वादियों की सदाओं में सांसें दिल की पाता हूं 
आवाज दे कर जहां, नीले आसमां को बुलाता हुं ,
उन सदाओं को तुम मेरी यादों का गीत सुना देना।

मर जाऊं तो मत रोना, मेरे गीत कविता गा देना।

मेरी मस्ती हो, किताबें हों, या हों वो ऊँची चोटियां,
हर जगह में बसा हूं मैं, मेरी अपनी सब बस्तियां,
सदा रहूंगा पास तुम्हारे, बस एक बार दिल से सदा देना,
मर जाऊं तो मत रोना, मेरे गीत कविता गा देना।

Monday, February 5, 2024

प्यार का खत

प्यार का जब खत पहला लिखा था।
नाम उसका मेरी जानां लिखा था।।

बयाने दिल काम मुश्किल बड़ा था
खत लिखने को सारी रात जगा था 
लिख लिख कर खत फाड़ें पचासों 
तब कहीं हाल दिल का लिखा था।।
नाम उसका मेरी जानां लिखा था।।

नज़रों को उसकी जादू लिखा था
सावन घटा जुल्फों को लिखा था 
गौरे रंग को हाय संगेमरमर ,
और बदन तिलस्माना लिखा था ।।
नाम उसका मेरी जानां लिखा था।।

कटती नहीं रातें ये भी लिखा था
आईने में दिखता चेहरा लिखा था 
सामने शायद मैं कह नहीं पाता
खत में आशिक़ तुम्हारा लिखा था।।
नाम उसका मेरी जानां लिखा था।।

प्यार का जब खत पहला लिखा था।
नाम उसका मेरी जानां लिखा था।।

Wednesday, June 18, 2008

मेघ मल्हार

घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार, अली री !
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार

चमक-चम-चम बिजुरीया चमके,
छमक-छम-छम पानी की बौछार, अली री
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार

कल-कल-कल-कल,संगीत नदी का,
सर-सर-सर-सर , करे आम की डार, अली री
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार

हरीतिमा ओढे, बैठी धरती लजाई,
और सतरंगी श्रावन करे श्रुंगार , अली री
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार

पंख फैलाये वन नाचे मयूरा
पिहु-पिहु-पिहु-पिहु, पपीहे की पुकार , अली री
घनन-घन-घन,मेघ गाये मल्हार

सावन रुत आयी

सावन रुत आयी

रिमझिम मेघा बरसे,
मेह झरे अंबर से,
घनाघन घन गरजे,
हरीतिमा है छायी |

पीहू-पीहू बोले पपीहा,
कुहू-कुहू कोयलीया,
हर्षाये धरा का जीया,
तन जो बुंदे भिगायी |

बहे झरने झर-झर ,
करे समीर फर-फर,
आकाश से आयी उतर,
अमृता गंगा मायी

Tuesday, November 6, 2007

दिप उत्सव

इस बार कुछ कारणों से दिप उत्सव अकेले ही मनाना पडेगा सो इस बात से मन जरा उदास हो रहा था और अचानक देखा तो मन से कुछ व्यथा बही और शब्दों का आवरण पहन ये गीत सामने आया |

अकेला हूं घर में तो लगता है, अंधेरा है|

द्वार पर दीपक , खिड़की मे सितारों की माला,
कुछ उंचा आकाश कंदिल भी मैने टांग डाला,
मगर दिप उत्सव ने यहाँ मुँह नही फेरा है,
अकेला हूं घर में तो लगता है, अंधेरा है|

बाहर उत्सव का शोर है, रात में भी भोर है,
सब चेहरे वही है मगर चेहरों का रंग और है,
ढुंढता हूं कहाँ प्रिये चेहरा तेरा सुनहरा है
अकेला हूं घर में तो लगता है, अंधेरा है|

द्वार पर पत्तों का मंडप,हर घर रांगोली ,
भेंटथाल के बहाने गुंजेगी हर घर बोली,
यहां मगर लगे की एकांत का पहरा है ,
अकेला हूं घर में तो लगता है, अंधेरा है|

Friday, May 18, 2007

पगडंडी

पगडंडी हूं मैं पगडंडी,
खेतों से इठलाती चली |

चने के पौधों को सहलाते,
गेहूं के पास से बल खाते,
इस छोर से उस छोर,
चली मैं मदमदाती चली |

कभी तीखी धूप मे हांफते,
आम की छांव मे सुस्ताते,
कभी बारीश मे नहाती मैं,
गीत ऋत का सुनाती चली |

नर-नारी , बच्चे ,मवेशी ,
ट्रेक्टर और ट्रक कभी-कभी,
हर आने जाने वाले को
लाती चली मै लेजाती चली |

आ गई अब उम्र की ढलान,
खत्म हो रहे खेत-खलिहान,
कभी छोडे थे कदमों के निशां,
ये पीढ़ी उनको मिटाती चली |

Thursday, April 19, 2007

नयनो की भाषा बोलो तुम

नयनो की भाषा बोलो तुम
मूक ये बोली बडी निराली है |

शब्द व्यर्थ शोर करते है
अर्थ का अनर्थ करते है
प्रित की भाषा के फुल
यूं खिलने से डरते है

संवाद मे मद घोलो तुम
आंखे तुम्हारी मतवाली है |

गणीत व्याकरण का भूलो
मन के हिन्डोले झूलो
अपने अंतस की कोमल
भावनाओ के द्वार छू लो

करो दान सारी भावनाये
चक्षू ये कर्ण से दानी है |

Tuesday, April 17, 2007

मन मे काफी कुछ बतियाने को है

मन मे काफी कुछ बतियाने को है
दुख-सुख और पिडा बताने को है

कोई दिन बचपन के थे सुनहरे ,
खेला करते थे जब शाम-सवेरे,
उम्र का वो पडाव था बडा अनोखा,
वो यादें कभी भी न भुलाने को है|

कोई दिन था जब साथ था उजाला,
सब था रोशन,न था कुछ भी काला,
वो गुज़रा हुआ वक़्त अब महज,
एक दास्तां है , बस सुनाने को है |

आज समय अलग है एकदम,
करना है बहूत ,वक़्त है कम,
कंधे टुट कर गीर जायेंगे,बोझ,
इतना सारा कांधो पे उठाने को है |