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Monday, January 16, 2023

अमृत

 तेरी यादों से

महकने को अनंतकाल तक,


सोचता हूं,


चांद की रोशनी में भीगा हुवा,

एक कटोरी दूध,

शरद पुनम की रात पी लूं,


सुना है उस दिन ,

चांद की रोशनी से,

अमृत बरसता है 

**ऋषिकेश खोड़के "रूह"****

Thursday, April 19, 2007

बंदर मामा

बंदर मामा,बंदर मामा,
समझे खुद को सयाना,
चने रखे थे कुप्पी मे,
चाहता था उसको चुराना |
कुप्पी मे हाथ डाल कर,
सोचा उसने चने निकालु,
एक दो से होगा क्या,
पुरी मुठ्ठी भर डालूं |
पर उसका हाथ न निकले,
जोर से यहां वहां उछले,
बंदर मामा कुछ न समझे,
आखीर हाथ कैसे निकले |
उछल कुद मे कुप्पी फुटी,
चोट खाई बंदर मामा ने,
लौगो ने मार भगाया,
मिला न उसको दाना रे |