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Monday, May 20, 2024

हाकिम से बदजुबानी करते हैं

हाकिम से बदजुबानी करते हैं ।
चलो हम कुछ तुफानी करते हैं ।।

ख़ूब घूमे हैं जो कर के सीना चौड़ा।
आज उनको पानी पानी करते हैं ।।

भूखे रोज़ सो जाते हैं सड़कों पर।
कभी उनकी मेज़बानी करते हैं ।।

रह गई है कुछ दास्तां बिन कहे।
दास्ताँ गो उनकी कहानी करते हैं ।।

इंकलाब की ख़्वाहिश हर दिल में ।
बयां रूह की वो ज़बानी करते हैं ।।

Wednesday, April 3, 2024

ग़ज़ल

लौ-ए-इश्क़ को हवा न दे।
कही तुझको जला न दे।।
ज़िक्र-ए-इश्क नामंज़ूर।
कोई तुझको बता न दे।।
बांध कर रखो जुल्फों को।
बाद-ए-शोख उड़ा न दे।।
चांद फिरे है इतराता।
रूख तिरा कोई दिखा न दे।
न पूछ राजे-दिले-रूह।
चीर के सीना दिखा न दे।।

Wednesday, March 27, 2024

ग़ज़ल

दिल तुझ से लगाया गुनाह किया।
तुझको खुदा बनाया गुनाह किया।।
पता न था के हो जाएगा कलम।
सजदे सर झुकाया गुनाह किया ।।
भूल गया था दाग चांद पर भी है  ।
तुमको चांद बुलाया गुनाह किया।।
मोती से आंसू खाक मे मिले जाते हैं।
तुमने मुझे रुलाया गुनाह किया ।। 
ग़ज़ल इक तुम पर भी लिख देता।
दिल "रूह" का दुखाया गुनाह किया।।

Tuesday, January 30, 2024

मस्जिद में ना वो मंदर मिला (ग़ज़ल)

मस्जिद में ना वो मंदर मिला।
उसे जो ढूंढा वो अंदर मिला।।
सच खोजने को गए जहां भी।
बस झूठों का समंदर मिला ।।
इंसा की बस्ती में दश्त से आए।
बड़ा खौफनाक मंजर मिला।।
अन अल हक़्क़ सदा पे मंसूर।
फंदा हमेशा गले पर मिला।।
जात पात और धर्म के नाम।
नही कुछ सिवा बवंडर मिला।।
देखा जो मैने माज़ी में सबके।
पुरखों के नाम बंदर मिला।।
बोझ कितना "रूह" न पूछों।
मन मन भर मन पर मिला ।।

**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

Wednesday, January 10, 2024

शह और मात का खेल है (ग़ज़ल)

शह और मात का खेल है।
राजनीति बड़ी चुड़ैल है।।
कांधे पर जुआ ज़िंदगी का
आदमी कोल्हू का बैल है।।
भीड़ ही भीड़ दूर तलक ।
सब और रेलम पेल है।।
अपने जी का करोगे कैसे।
दूसरों के हाथ नकेल है।
मन का घड़ा भरता नहीं।
क्या किसी के पास गुलेल है।।
**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

Saturday, January 6, 2024

जो भी कहना मिल कर कहना। (ग़ज़ल)

जो भी कहना मिल कर कहना।
नहीं पीठ पीछे, मुंह पर कहना।।
न रखना कुछ दिल मे अपने।
कहना जो भी खुल कर कहना।।
खो जाए जहां खुर के निशान।
उसे गांव नहीं शहर कहना ।।
जो बह रहा,  सब मल मूत्र है।
नदी नही इसे गटर कहना।।
सही गलत सबको पता रूह।
चाहे ना कोई मगर कहना।।

Saturday, December 30, 2023

वाणी का चिंतन गहन करें। (ग़ज़ल)

वाणी का चिंतन गहन करें।
शब्दों का उचित चयन करें।।
उम्र से अपनी बड़ा हो कोई।
झुका कर सर नमन करें।।
दग्ध हो जायेगा जीवन सारा।
अहम अपना दहन करें।।
आने वाली पीढ़ी के खातिर।
आओ प्रकृति का जतन करें।।
अद्भुत समस्त ये संसार है।
जाइए इसमें भ्रमण करें।
ऊंच नीच जात पात धरम।
विष ये समस्त वमन करें।
सलाह नही रूह के विचार।
इच्छा हो तो आप ग्रहण करें।

Monday, December 18, 2023

परों को आजमा के देखो। (ग़ज़ल)

परों को आजमा के देखो।
ऊंचाइयों पे जा के देखो।।
कोई आवाज़ नही उठेगी।
बस्तियों को जला के देखो।।
कब्जे में हैं फुटपाथ भी।
चादर तो बिछा के देखो।।
फुटपाथ पे मरी सर्दी।
चादर को हटा के देखो।।
परिंदे आ ही जायेंगें।
दरख्तों को लगा के देखो।।
किसी का टिफिन बॉक्स है।
कूड़े के पास जाके देखो ।।
कोई सुन ले रूह शायद
शोर में चिल्ला के देखो।

Thursday, December 14, 2023

धूप को छांव (ग़ज़ल)

धूप को छांव कहना सीख लिया है।
हर हाल में रहना सीख लिया है।।
कब तक रोक सकोगे तुम उसको।
जज़्बात ने बहना सीख लिया है।।
अम्मा ने पूछा हाल, ब्याही बेटी का।
बोली वो अब सहना सीख लिया है।।
तवारीख़ धुंधली पड़ने लगी तो ।
इमारत ने ढहना सीख लिया है 
मानिंदे मोती रूह पिरोये आसूं 
उसने ये गहना सीख लिया है।।

Saturday, December 9, 2023

दिल में हमारे (ग़ज़ल )

दिल में हमारे रह कर तो देखो।
छोटी जगह में बड़ा घर तो देखो।।
हम तो मुंतज़िर हैं जाने कब से।
उठाओ नज़रे, ज़रा इधर तो देखो ।।
नज़रें मिलाकर नजरें छुपाना।
दिल चुराने का हुनर तो देखो।।
बड़ी छोटी सी इक अर्ज है हमारी।
साथ हो ज़िंदगी का सफ़र तो देखो।।
बड़ा ध्यान देकर सुनते हैं वो।
रूह की शायरी का असर तो देखो।।

आरामपसंद (ग़ज़ल)

आरामपसंद भी हो जायेंगे ।
बिस्तर पर बांस के सो जायेंगे।।
ख्वाहिशें कुछ अब भी बाकी है।
और यम कहता है चलो जायेंगे।।
दुआ मांगों देख डूबता सितारा।
अरमान मुकम्मल हो जायेंगे।।
ख्वाबों को अपने जिंदा रखना।
वक्त की आंधी में ये खो जायेंगे।।
भेड़ चाल में फंस कर रह गए।
अकेले अब कहीं चलो जायेंगे।।
कुछ घूंट बचे हैं ज़ीस्त के साकी।
अब पीकर हम इसको जायेंगें।।
रूह कहे सब अजर अमर है।
सिर्फ बदल जिस्म ही तो जायेंगे।
**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

Friday, November 10, 2023

चलिए उनसे बात करेंगे

चलिए उनसे बात करेंगे।
ज़ाहिर दिले-जज़्बात करेंगे।

इश्क शायद होगा मुश्किल ।
कोशिश हम दिन रात करेंगे।।

खड़े हैं दर पर ले के झोली ।
हुज़ूर आयेंगे ख़ैरात करेगें।

भरे पड़े हैं आखों के बादल।
जाने कब बरसात करेंगे।।

तैयार होकर रूह खड़े हैं।
मालुम है वो घात करेंगे

Saturday, October 14, 2023

सफर कोई हो, मंज़िल तुम्ही हो।

सफर कोई हो, मंज़िल तुम्ही हो।
हर राह का , हासिल तुम्ही हो।।
दरिया हूं आखिर कहां जाऊंगा।
मेरी मौजों का साहिल तुम्ही हो।।
तफ्तीश का ढोंग क्यू करते हो।
मुमतहिन, मेरे कातिल तुम्ही हो।।
आज़मा कर देखे जाने कितने।
आखिर पाया की कामिल तुम्ही हो।।
रिश्तों की गरमी जो बनाए रखे ।
रूह इतने काबिल तुम्ही हो।।


कामिल : संपूर्ण 
मुमतहिन : जाँचने वाला

Wednesday, September 13, 2023

बदले हुए हैं मंजर

बदले हुए हैं मंजर हम ख़ामोश है।
सब आंखों में समंदर हम ख़ामोश है।।
नफ़रतें ज़हन में बसेरा कर चुकी।
देख हाथों में खंजर हम ख़ामोश है।
जंगल पर्वत नदिया बर्बाद कर चुके।
जमीं हो रही बंजर हम ख़ामोश है।।
शमशीर ली उठा जो काटे नाखून।
कर दुनियां खंडर हम ख़ामोश है।।
हालात बदलना मुश्किल भी नहीं।
पर मान के मुकद्दर हम ख़ामोश है।।

**ऋषिकेश खोडके "रुह"**

Monday, August 28, 2023

लाख कह दो तुम की ख़राब

लाख कह दो तुम की ख़राब है।
मुझे सुकूं देने वाली शराब है ।।
मसला जो उसने ,दिल था मेरा।
शायद सोचा महज़ गुलाब है ।।
क्यूं भटकता है दिले- आवारा।।
इश्क कुछ और नही सराब है।।
करो कोशिश पढ़ के देखो तो।
ज़िंदगी मेरी खुली किताब है।।
बड़े थाट से लेटा रूह कब्र में।
जन्नत का जैसे कोई नवाब है।
**ऋषिकेश खोड़के "रूह"**

Wednesday, August 23, 2023

चांद पाने की ख़्वाहिश कर के देखो।

चांद पाने की ख़्वाहिश कर के देखो।
हौसले की आज़माइश कर के देखो।।
क्या पता दिल तुमको दे ही बैठे।
एक बार फ़रमाइश कर के देखो।।
कोई कीमत नही है जज्बातों की ।
चाहो तो कभी नुमाइश कर के देखो।।
दो गज जमीं भी अब कहां हासिल है।
कब्रिस्ता की पैमाइश कर के देखो।।
वो चांद पर जमीं ढूंढते हैं रूह ।।
तुम भी ज़रा सिफ़ारिश कर के देखो।।

मुझमें कुछ तेरे जैसा रहता है।

मुझमें कुछ तेरे जैसा रहता है।
मैं तेरी धड़कन हूं ये कहता है।।
अश्क नही है ये तो बस पानी है।
एक समंदर आंखों से बहता है।।
मुझ से मत पूछिए हिज्र के माने।
बरसों से यही तो दिल सहता है।।
झूठे ही सही हमको तुम पुकारों तो।
कहां कोई आसमान यूं ढहता है ।।
"रूह" के जैसे है कोई मस्त मलंग।
बस अपनी ही धुन में रहता है ।।

फासिला दरमियान इतना तो न था

फासिला दरमियान इतना तो न था।
सोचा था तूने जितना उतना तो न था ।।
जानते हो नज़र उठेगी तो ज़रूर।
फिर मेरे ही सामने रुकना तो न था।।
नशा हुस्न का खुद मालूम है तुमको  ।
बज्म में फिर तुम्हे दिखना तो न था ।।
गुजर गया मैं, तुझे खबर भी नहीं।
खुद की मुहब्बत में चितना तो न था।।
खुद को वो रूह खुदा समझ बैठेंगे।
इस तरहा सामने झुकना तो न था ।।

Friday, July 7, 2023

ग़ज़ल

बातों में तेरी जायका हरबार अलग है।
कुछ तो बात है तुझमें जो यार अलग है।।
जख्म नही होता लेकिन दिल में चुभते हैं।
ज़ालिम ये तेरी आंखों के औजार अलग हैं ।।
रहने दे चरागर के दवा काम की नहीं ।
ये मर्ज अलग है, तेरा बीमार अलग है।
झूठे तेरे वादें है सारे हम को है मालूम।।
कह तू चाहे जितना की इस बार अलग है।।
मौसम बहारों का रूह आता है जाता है।
तू साथ है तो अब की ये बहार अलग है।।

Thursday, June 29, 2023

बातें

मुझे समझ नही आती दिखावटी बातें।
चेहरे से लिपटी हुई ये सजावटी बातें ।।
फूट ही जानें दो गुबार दिल का अपने।
आने दो लब पे थोड़ी बगावती बातें।।
लफ्जों की लागलपेट बस की नही मेरे ।
कर नही सकता मैं ये मिलावटी बातें ।।
हुस्न के आगे कमबख्त दिल बेबस है।
डरता हुं कर न दे कोई शरारती बातें ।।
ना कोई औलिया ना कोई पीर फकीर।
रूह पर करता है बड़ी करामती बातें ।।

**ऋषिकेश खोडके "रूह"**