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Wednesday, August 21, 2024

ज़माने की सियासत (ग़ज़ल)

ज़माने की सियासत में, कहाँ इन्सान रहता है।
अमीरी और ग़रीबी में, फसा हैरान रहता है।।

न देखा दर्द दुनिया का, न समझा भूख को अब तक।
हुकूमत के भरोसे पर, वही नादान रहता है।।

सभी  कुछ  है  वहां पैसों  भरा  घर  है  अगर  कोई ।
मगर भूखे के घर में, महज़  इक भगवान रहता है।।

बड़ा मुश्किल है जीना अब, किसी के  साथ रहना भी।
यहाँ हर शख़्स खुद में ही, बहुत वीरान रहता है।।

उठा आवाज़ तू  खुलकर  , बदल दे  दश्त के मंजर।
सियासत की फज़ा में रूह , जो तूफ़ान रहता है।।

Wednesday, June 12, 2024

सौदाई को माने रखते हैं (ग़ज़ल/

सौदाई को माने रखते हैं।
तेरे खत सिरहाने रखते हैं।।

तुम कब आते हो कब जाते हो ।
सारा इल्म दिवाने रखते है।।

कीमत फूल की बढ़ जाए है जब ।
जुल्फों में वो दिखाने रखते है ।।

लब आंखें जुल्फें कितने आखिर ।
सुंदर लोग ख़ज़ाने रखते है ।।

तुझसे मिलने खातिर "रूह"  मियां।
अक्सर अच्छे बहाने रखते है ।।


रचना निम्नलिखित बह्र में है:
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22     22    22    22     2

Thursday, May 30, 2024

वो गांव छोड़ नगर आया है (ग़ज़ल)

वो गांव छोड़ नगर आया हैं  ।
क्या सोच कर इधर आया है ।।

नकली फूल हवा पत्ते सब  ।
क्या लेने वो  नगर आया है ।।

जल्दी रात में सोने वाला  ।
पब से देख सहर आया है  ।।

इमारतों के इस जंगल में ।
दीवारों पे   शजर  आया  है ।।

रौशनी हो गई रूम मे रूह  ।
सूरज मकां  उतर  आया  है ।।

Sunday, May 26, 2024

भक्त सभी आगे पीछे हैं (ग़ज़ल)

भक्त सभी आगे पीछे है।
कीड़े मकोड़े बस नीचे है।।

फूल रही है नफरत काफ़ी।
जाने कौन इसको सींचे है।।

बढ़ जाए जो ख़ुद से आगे।
सब नीचे उसको खींचे है।।

लोक लुभावन दिखते तो हैं।
सब पकवान मगर  फीके है।।

लंबी गर्दन वाले पंछी ।
संकट में आँखें मीचे है।।

तबदीली लाएंगे कैसे ।
गर्दन, नज़रें सब नीचे है।।

सच तुम रूह न करना ज़ाहिर।
सच के लिए जहां पीछे है ।।

रचना निम्नलिखित बह्र में है:
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22      22    22    22

Saturday, May 18, 2024

सारी मय उतर गई (ग़ज़ल)

सारी मय  उतर गई ।
जब उन पर नज़र गई ।।

हैरां चांद सोचकर ।
वो कितना निखर गई ।।

आशिक इश्क़ में जले ।
क्या उनको ख़बर गई ।।

रुप उसका तिलिस्म है ।
मंतर फूँक  कर गई ।।

नज़रें रूह तू हटा ।
दिल में वो उतर गई ।।


रचना निम्नलिखित बह्र में है:
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22

Saturday, May 11, 2024

बात मिलने की करता है (ग़ज़ल)

बात मिलने की करता है।
पर ज़माने से डरता है।।
क्या भरोसा कातिल का हो।
आस्तीं खंजर रखता है।।
दर्द  हो ना जाए शाए ।
इसलिए वो संवरता है ।।
अब्र ना छलके आँखों  से।
अश्क चश्मों में रखता है ।।
रूह क्या जी कर पाएगा ।
मौत से पहले मरता  है ।।

रचना निम्नलिखित बह्र में है:
सरे_ मुसद्दस मसकन मक़तो मनहोर
फ़ाएलातुन मफ़ऊलुन फ़े
2122 222 2

Friday, May 10, 2024

गम भरी रात (ग़ज़ल)

गम भरी रात तू और मैं ।
दिल के जज़्बात तू और मैं ।।
याद करना फकत रस्म है 
हैं सदा साथ तू और मैं।।
कुछ न बौले न  कुछ भी सुना ।
कर गए बात तू और मैं ।।
मांगता हूं दुआ काश हो 
तेज बरसात तू और मैं।।
रूह जाए कहां दिल चुरा ।
मौन लम्हात  तू और मैं।।


रचना निम्नलिखित बह्र में है:

मुतदारिक मुसद्दस सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212212212

Wednesday, April 24, 2024

ग़ज़ल (ज़िंदा लेकिन मरे हुए हैं)

ज़िंदा लेकिन मरे हुए हैं ।
देखो कितना डरे हुए हैं ।।
सड़कों पर रेंगता भरोसा ।
झूठे वादे पड़े हुए हैं ।।
रखना दुश्वार काबू खुद को ।
सब गुस्से से भरे हुए हैं ।।
उम्मीदें क्या क़तील को हो ।।
कातिल हाकिम बने हुए हैं ।।
कह दे अशआर रूह बाग़ी ।
शा'इर सारे डरे हुए हैं ।।
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बह्र :
हज़ज मुसद्दस अख़्र्म उश्तुर महज़ूफ़
मफ़ऊलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
222 212 122

Thursday, April 18, 2024

ग़ज़ल


ग़ज़ल की बह्र: रमल मुसद्दस महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122       2122      212

दर्द  सारा साथ ले कर सो गए।
नैन में बरसात ले कर सो गए।।

छूट जाये ना तिरी नजदीकियां।
हाथ में हम हाथ ले कर सो गए।।

साथ हमने शब  गुज़ारी जाग के ।
ऊँघती फिर रात ले कर सो गए।।

थक गए जब जाग के तो आख़िरश।
मौत की सौगात ले कर सो गए ।।

ग़म भुलाने को लिखे थे रूह जो 
साथ वो नग़मात ले कर सो गए ।।
**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

Wednesday, April 17, 2024

ग़ज़ल

तूफाने ज़ीस्त में जलना नहीं आसाँ।।
गिर के फिर से संभलना नहीं आसाँ।।
क्या तेरे मिरे,जज़्बात हैं सबके ।
इन्हें अल्फ़ाज़ में बदलना नहीं आसाँ।।
सुरत बदलकर मिलते हैं सभी सब से ।
हमेशा चेहरा बदलना नहीं आसाँ।।
ज़रूरत तो इक दलदल गहरा सा है।
फंसे तो बाहर निकलना नहीं आसाँ।।
भरे बाज़ार हैं मौका-परस्तों से ।
यहां ईमान पे पलना नहीं आसाँ ।।
कभी तो वक़्त बदलेगा है उम्मीद।
हमेशा हसरत कुचलना नहीं आसाँ।।
बुलंदी रूह सौदा बहुत मुश्किल।
बुलंदीयों पे संभलना नहीं आसाँ।।

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222

1 2 2    2 1   2  2 2    12। 22
तू फा ने ज़ी स्त में जलना नहीं आसाँ।।
1 2      2। 2 1 2 2 2 1222
गिर के फिर से संभलना नहीं आसाँ।।

12 22 12।  2 2 1   2 2 2
क्या तेरे मिरे। जज़्बात हैं सबके ।
12 2 2 1      2   2 2 1222
इन्हें अल्फ़ाज़ मेंब दलना नहीं आसाँ।। *में का वज़न गिराया है।

1 2    2   2   1 2   2  2 1 2 2    2
सु रत बद लक र मिलते हैं सभी सब से
1 2 2   2  1 2      2    2 1 222
हमेशा   चे। ह राब। दल ना नहीं आसाँ।। *रा का वज़न गिरायाहै

122     2  1 2  2    2   12 22
ज़रूरत तो इकद लद लग हरा सा है।
12   2 2  1  2   2   2  1222
फंसे तो बा ह रनिकलना नहीं आसाँ।।

1 2 2 2 1 2     22 1 2 2  2
भरे बा ज़ार सब मौका-परस्तों से
1 2 2 2 1 2 22   1 2  22
यहां ईमान पे पलना नहीं आसाँ।।

1 2  2     2 1 2  2  2 1 2. 22
कभी तो। वक़्त बद ले। गा है उम्मीद। +1 नियम, गा का वजन 
122   2   1 2    2  2    1222
हमेशा हस र तकु चलना नहीं आसाँ।।

1 2 2 2 1  2 2   2  1  222
बुलंदी  रूह सौदा। बहुत मुश्किल।
1 2 2 2 1  222     1222
बुलंदी यों पे संभलना नहीं आसाँ।।

Saturday, April 13, 2024

ग़ज़ल

सबसे जुदा हो गए हो।
तुम तो ख़ुदा हो गए हो ।।

इस तरह जाते हो छू कर।
गोया सबा हो गए हो ।।

नज़रें गिराना उठा के ।
कातिल अदा हो गए हो ।।

हुस्न की तारीफ़ क्या हो।
दिल की दवा हो गए हो ।। 

कौन करे चांद की बात। 
उसकी कज़ा हो गए हो।।

नाम अगर पूछ लिया।
कितना ख़फ़ा हो गए हो ।।

कैसे कहूं रूह के तुम ।
जाने जहां हो गए हो ।।

बह्र : रज्ज़ मुरब्बा मतवी
मुफ़तइलुन मुफ़तइलुन
21122112