किनारे बंधा, पर लहर में रहा।।
न दरबार मेरा, न कोई महल।
जहां भी रहा अपने घर में रहा।।
झुकाना ज़माने ने चाहा मुझे।
लड़ा उम्र सारी, समर में रहा।।
मुझे हार ने भी सँवारा बहुत।
गिरा भी, उठा भी, सफ़र में रहा।।
बिके लोग महफ़िल में औक़ात पर।
वहाँ "रूह" असली ख़बर में रहा।।
No comments:
Post a Comment