Tuesday, September 15, 2026

सफ़रनामा

कभी सफ़र पर निकलना,
कभी किसी बियाबान में
रास्ता ढूँढ़ते-ढूँढ़ते
खुद को खो देना।

कभी रोज़गार की तलाश में
चप्पलों के तलवे घिसना,
कभी किसी की नाराज़गी में
उसकी गली की धूल
कपड़ों पर लगा लेना।

कभी बाइक,
कभी कार निकालना —
पता नहीं कहाँ जाना है,
बस पेट्रोल जलता रहता है
और शहर पीछे छूटते जाते हैं।

कभी गुस्सा
पैरों में भर जाता है,
और आदमी
बिना मंज़िल के
सड़क पर निकल पड़ता है।

कभी बैरागी होकर
पहाड़ों में चले जाते हैं—
चुप्पी ओढ़कर,
ध्यान में बैठने।

और कभी
पर्वतारोही बनकर
पहाड़ को नापते हैं,
जैसे ऊँचाई से
कुछ नीचे छूट जाएगा।

न जाने कितने सफ़र हैं
जिनके नाम भी याद नहीं,
कितनी राहें हैं
जो अब किसी नक्शे में नहीं मिलतीं।

मगर...

इन सब सफ़रों के आगे
एक सफ़र और है—
मन का।

वो अजीब मुसाफ़िर है,
पैरों से नहीं चलता,
फिर भी
दुनिया भर घूम आता है।

कभी बचपन की
धूल भरी गली में लौटता है,
कभी जवानी की
किसी अधूरी दोपहर में अटक जाता है।

कभी किसी के आग़ोश में
थोड़ी देर ठहरता है,
तो कभी
दर्द की ऐसी खामोश खाई में उतर जाता है
जहाँ आवाज़ भी
अपने होने से डरती है।

वो हर दरवाज़ा छू आता है,
हर राह से गुजरता है,
हर डगर पर
अपने पैरों के निशान ढूँढ़ता है—
जो कभी
ज़िंदगी ने मिटा दिए थे।

और कमाल देखिए...

कभी-कभी
वो वहाँ भी होकर आता है
जहाँ हम गए ही नहीं।

जो जिया नहीं,
उसे जी आता है।
जो कहा नहीं,
उसे कह आता है।
जो मिला नहीं,
उसे मिल आता है।

शायद
मन की यही आदत है—

वो समय का यात्री नहीं,
यादों का मुसाफ़िर है।

और इसलिए
दुनिया के सारे सफ़रनामे
एक तरफ़...

और मन का सफ़रनामा
एक तरफ़।

क्योंकि बाकी सफ़र
कहीं न कहीं पहुँच जाते हैं,

पर मन का सफ़र...

पता नहीं
कहाँ से शुरू होता है
और
कहाँ जाकर
फिर से
हम तक लौट आता है।