Monday, March 17, 2025

**उलटबांसी हाइकु**

पत्तों बिना ही 
दरख़्त ने दी छाया
धूप हंसी खूब।

घर था खाली,
बोल उठीं दीवारें,
चीखा सन्नाटा।

शून्य भीतर,
अनहद का नाद,
कौन सुनेगा?

प्यासी मछली,
जग वैतरणी में,
प्यास न बुझी ।

तन का बीज,
मन के तल पर,
खेत हैं मौन।

शब्द बहते 
गंगोत्री है मौन की,
सुनेगा कोई?

तेज धूप में,
देखो पकती छांव ,
कौन खायेगा?

अज्ञान तम,
ज्ञान दीपक तले,
सत दिखेगा?

वो अकिंचन
समाहित सबमें,
अंतस यात्रा।