हम बन के राख बिखर जायेंगे ।।
मिट्टी का जिस्म मिले मिट्टी में ।
ले कर क़्या साथ बशर जायेंगे ।।
आईनों से मत सच को पूछो ।
सुन के सच, आप मुकर जायेंगे ।।
यादों के रंगबिरंगे धागे ।
हम ग़ज़लों में बुनकर जायेंगे ।।
पेचीदा रूह बड़ी ये दुनिया।
समझे तो आप सँवर जायेंगे ।।
3 comments:
वाह्ह लाज़वाब गज़ल सर।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १० फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आईनों से मत सच को पूछो
अब आईने भी सच नहीं बताते हैँ
सुन्दर
वाह !
यादों के रंगबिरंगे धागे ।
हम ग़ज़लों में बुनकर जायेंगे ।।
बहुत खूब !
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