Sunday, April 2, 2023

अशआर

बस जिक्र तेरा ही रूहानी है मेरे लिए ।।
बाकी तो सब दुनिया फानी है मेरे लिए ।।


दूर तक जिन्दगी का सफर कर लिया है ।
लगता नही था करेंगे मगर कर लिया है ।।
और कब तक आखिर रखोगे यूं बैठा कर ।
काफ़ी है जितना हमने सबर कर लिया है ।।


मर गया तो लौट कर आऊंगा।
भूत बनकर सबको सताऊंगा।
गज़लों को मेरी दाद दे देना तुम।
वरना छाती पर चढ़ जाऊंगा ।।

इंतज़ार आखिर कितना करवाओगे।
अब क्या गंगा जल पिलाने आओगे।।
सुबह से बैठा हूं बिछा कर पलकें ।
के जब ढलेगा दिन तब तुम आओगे।।
दिल में एक छोटी सी जगह चाहता हूं।
तुम कहते हो भीड़ में कहां समाओगे।।

गम से बाहर निकलना किसको है।
तू नही तो फिर संभलना किसको है।।

अपने पास रहने दीजिए।
थोडा सा ख़ास रहने दीजिए।
वक्त हमारा भी आएगा कभी।
छोटी से आस रहने दीजिए।

**ऋषिकेश खोडके "रुह"**


Sunday, March 5, 2023

रंजिश है तो सामने से निभा

 रंजिश है तो सामने से निभा,

खंजर को मेरी पीठ ना दिखा ।।

ईमान तू रख दे बाजार में, 

देखें तो सही किस दाम बिका  ।।

कितना डरता है अल्फाजों से,

तख्त तेरा किस बात से हिला ।।

नफरत फैला तू चाहे जितनी,

हम नही देंगे बदलने फिज़ा ।।,

बयाने-रुह तो ना-फानी  है,

कर कोशिश, मिटा सके, मिटा ।।

Monday, February 27, 2023

तेरी यादों का स्वेटर

 आज फिर,

दिल की अटैची से,

नसाफत से तह किया हुआ,

तेरी यादों का स्वेटर निकाला है ।


अब भी तेरी खुशबू इसमें महकती है ।


मुझे उम्मीद है,

ऐसा एक स्वेटर,

तेरे पास भी होगा।


धूप में मत रखना, महक चली जाएगी।

जहन से तेरी तस्वीर हटाऊं कैसे

 जहन से तेरी तस्वीर हटाऊं कैसे |

सांस है तू, फिर लेना भूल जाऊं कैसे ||

मिनट में सौ बार धड़कता है लैकिन |

दिल की धड़कन तुम्हे सुनाऊं कैसे ||

कान्हा तो नही मैं पर बांसुरी तुम हो |

रख तो लूं होठों पर, बजाऊं कैसे  ||

लानत भैजो गर नजर हट जाएं।।

हुस्न पर पलकें झपकाऊं कैसे ।।

जो कहे रूह , कमबख्त कम है  ।

बयाने हुस्न को अल्फाज लाऊं कैसे ।।

***ऋषिकेष खोडके "रूह"***

Monday, January 16, 2023

अमृत

 तेरी यादों से

महकने को अनंतकाल तक,


सोचता हूं,


चांद की रोशनी में भीगा हुवा,

एक कटोरी दूध,

शरद पुनम की रात पी लूं,


सुना है उस दिन ,

चांद की रोशनी से,

अमृत बरसता है 

**ऋषिकेश खोड़के "रूह"****

Saturday, September 19, 2020

इक मर्ज ने सब बिगाड़ दिया।

 इक मर्ज ने सब बिगाड़ दिया।

आसरा कितनो का उजाड़ दिया ।।

भूख से बिलबिलाता था वो बच्चा।

तो खाना कचरे से जुगाड दिया।।

ज़िन्दगी की खातिर मिलों चल के,

मैराथन विजेता पछाड़ दिया।।

चलते चलते जो रुका सदा को,

वहीं सड़क किनारे गाड़ दिया ।।

जिसकी भी जहां जब थकी सांसे।

जिस्म से "रूह" को उखाड़ दिया ।।

Friday, September 11, 2020

पीढ़ा की आंच को ज़लने दो

अति पीढ़ा में 
दीर्घ काल तक बने रहना,
पीढ़ा को भुला देता है।

देखता हूं हम सब भी,
भूल चले हैं,
की किस अति भयावह संकट से,
 हम झुझ रहे हैं ।
भूल चले हैं,
की संकट नहीं टला है,
भूल चले हैं,
की सब कुछ ठीक नहीं हुआ है।
शतुरमुर्ग की तरह सर बालू में छुपा लेना,
खुद को दिलासा देना ही मात्र है,
मगर हम जानते हुवे भी ना सिर्फ,
अनभिज्ञ सा व्यवहार कर रहें हैं,
अपितू संकट को भयावह स्वरूप प्रदान करने के
वाहक बन रहे हैं।

देखता हूं मै,
अब सब निश्चिंक है,
की हम ठीक है और
कोई और है जो शायद नश्वर है।

रोजी रोटी,
कोई शायद इसीलिए मजबुर है,
पर सच में क्या सभी?
नहीं कुछ मजबुर नहीं ,
मात्र इंग्लिश शब्द के अनुसार बोर हैं।
रास्तों पर टूट पड़ने को आतुर,
मानसिक मनोरंजन के राही ये,
अपराधी ,समाज व सरकार के,
नहीं जानते,
मानवता ने क्या कुछ खोया है।

पीढ़ा में कोई नहीं बने रहना चाहता !
ना तुम , ना मै ।
और ना वो जो पापी पेट के लिए सड़क पर है,
पर सोचो क्या तुम जो अब भीड़ में हो,
क्या सच में जरूरी इस भीड़ का हिस्सा हो।

अति पीढ़ा में 
दीर्घ काल तक बने रहना,
पीढ़ा को भुला देता,
पर इस पीढ़ा की आंच को ज़लने दो।

*ऋषिकेश खो़डके "रूह"*