Wednesday, January 10, 2024

शह और मात का खेल है (ग़ज़ल)

शह और मात का खेल है।
राजनीति बड़ी चुड़ैल है।।
कांधे पर जुआ ज़िंदगी का
आदमी कोल्हू का बैल है।।
भीड़ ही भीड़ दूर तलक ।
सब और रेलम पेल है।।
अपने जी का करोगे कैसे।
दूसरों के हाथ नकेल है।
मन का घड़ा भरता नहीं।
क्या किसी के पास गुलेल है।।
**ऋषिकेश खोडके "रूह"**

Saturday, January 6, 2024

जो भी कहना मिल कर कहना। (ग़ज़ल)

जो भी कहना मिल कर कहना।
नहीं पीठ पीछे, मुंह पर कहना।।
न रखना कुछ दिल मे अपने।
कहना जो भी खुल कर कहना।।
खो जाए जहां खुर के निशान।
उसे गांव नहीं शहर कहना ।।
जो बह रहा,  सब मल मूत्र है।
नदी नही इसे गटर कहना।।
सही गलत सबको पता रूह।
चाहे ना कोई मगर कहना।।

Saturday, December 30, 2023

वाणी का चिंतन गहन करें। (ग़ज़ल)

वाणी का चिंतन गहन करें।
शब्दों का उचित चयन करें।।
उम्र से अपनी बड़ा हो कोई।
झुका कर सर नमन करें।।
दग्ध हो जायेगा जीवन सारा।
अहम अपना दहन करें।।
आने वाली पीढ़ी के खातिर।
आओ प्रकृति का जतन करें।।
अद्भुत समस्त ये संसार है।
जाइए इसमें भ्रमण करें।
ऊंच नीच जात पात धरम।
विष ये समस्त वमन करें।
सलाह नही रूह के विचार।
इच्छा हो तो आप ग्रहण करें।

Monday, December 18, 2023

परों को आजमा के देखो। (ग़ज़ल)

परों को आजमा के देखो।
ऊंचाइयों पे जा के देखो।।
कोई आवाज़ नही उठेगी।
बस्तियों को जला के देखो।।
कब्जे में हैं फुटपाथ भी।
चादर तो बिछा के देखो।।
फुटपाथ पे मरी सर्दी।
चादर को हटा के देखो।।
परिंदे आ ही जायेंगें।
दरख्तों को लगा के देखो।।
किसी का टिफिन बॉक्स है।
कूड़े के पास जाके देखो ।।
कोई सुन ले रूह शायद
शोर में चिल्ला के देखो।

Thursday, December 14, 2023

धूप को छांव (ग़ज़ल)

धूप को छांव कहना सीख लिया है।
हर हाल में रहना सीख लिया है।।
कब तक रोक सकोगे तुम उसको।
जज़्बात ने बहना सीख लिया है।।
अम्मा ने पूछा हाल, ब्याही बेटी का।
बोली वो अब सहना सीख लिया है।।
तवारीख़ धुंधली पड़ने लगी तो ।
इमारत ने ढहना सीख लिया है 
मानिंदे मोती रूह पिरोये आसूं 
उसने ये गहना सीख लिया है।।

Saturday, December 9, 2023

दिल में हमारे (ग़ज़ल )

दिल में हमारे रह कर तो देखो।
छोटी जगह में बड़ा घर तो देखो।।
हम तो मुंतज़िर हैं जाने कब से।
उठाओ नज़रे, ज़रा इधर तो देखो ।।
नज़रें मिलाकर नजरें छुपाना।
दिल चुराने का हुनर तो देखो।।
बड़ी छोटी सी इक अर्ज है हमारी।
साथ हो ज़िंदगी का सफ़र तो देखो।।
बड़ा ध्यान देकर सुनते हैं वो।
रूह की शायरी का असर तो देखो।।

आरामपसंद (ग़ज़ल)

आरामपसंद भी हो जायेंगे ।
बिस्तर पर बांस के सो जायेंगे।।
ख्वाहिशें कुछ अब भी बाकी है।
और यम कहता है चलो जायेंगे।।
दुआ मांगों देख डूबता सितारा।
अरमान मुकम्मल हो जायेंगे।।
ख्वाबों को अपने जिंदा रखना।
वक्त की आंधी में ये खो जायेंगे।।
भेड़ चाल में फंस कर रह गए।
अकेले अब कहीं चलो जायेंगे।।
कुछ घूंट बचे हैं ज़ीस्त के साकी।
अब पीकर हम इसको जायेंगें।।
रूह कहे सब अजर अमर है।
सिर्फ बदल जिस्म ही तो जायेंगे।
**ऋषिकेश खोडके "रूह"**