चाह है इश्क़, आह भी है।
ज़िंदगानी तबाह भी है।।
दास्ताँ सब नही सुनहरी।
बारहा ये सियाह भी है।।
ज़ीस्त के पाँव जल रहे हैं।
धूप इसकी गवाह भी है।।
शहर की भीड़ में अकेली।
एक गुमनाम राह भी है।।
रूह खूँटी पे टाँग दो अब।
चाहते जो अथाह भी है।।
ऋषिकेश खोङके "रुह"
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