द्वार खड़ी मैं, जुग बीते,
साजन तुम नहीं आए।
भोर भई फिर साँझ ढली,
फूल बनी, कुम्हलाई कली,
चैत्र चला, फागुन भी बीता,
अखियन सूखी जाए।
साजन तुम नहीं आए।।
बांट तकत, सावन सूखा,
सिंगार मन मोरा रूठा,
खनक चूडीयन मौन भई,
दर्पन नाही देखो जाए।
साजन तुम नहीं आए।।
कोई खबर लाए ना पुरवाई,
अखियां! असूअन! धुँधलाई,
प्रान निकसत जात है मोरे,
पर तन ना छोड़ो जाए।
साजन तुम नहीं आए।।
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