मन चंगा तो कठौती में गंगा,
साधो ये बात हुई पुरानी।
मन तो प्रदुषित पहले ही थे,
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।
आचमन अब कहाँ सम्भव है,
इस गंगा, जमना के पानी से।
हालत इन नदियों की अब,
बेहतर नहीं किसी नाली से ।।
धुलते होंगें पाप कभी ,
अब ये रोग का घर है ज्ञानी।।
मन तो प्रदुषित पहले ही थे,
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।
नदियों को मइया कहने वाले,
अब इसमें गटर बहाते हैं।
नदी किनारे कारखाने,
आँचल में जहर छुपाते हैं।।
अनपढ़ कहूँ मैं, बड़े भले है
जब शिक्षित करे नादानी।।
मन तो प्रदुषित पहले ही थे,
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।
कुछ गायब, कुछ कगार पर,
कुछ नदियां अब गटर हुई।
टेम्स नदी के दिवानों को,
कब देसी नदी की फ़िकर हुई।
योजना बस काग़ज़ पर है,
और घाटों पर है वीरानी।।
मन तो प्रदुषित पहले ही थे,
अब प्रदुषित गंगा का पानी।।
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