तेरी यादों से
महकने को अनंतकाल तक,
सोचता हूं,
चांद की रोशनी में भीगा हुवा,
एक कटोरी दूध,
शरद पुनम की रात पी लूं,
सुना है उस दिन ,
चांद की रोशनी से,
अमृत बरसता है
**ऋषिकेश खोड़के "रूह"****
ऋषिकेश खोङके "रुह"
तेरी यादों से
महकने को अनंतकाल तक,
सोचता हूं,
चांद की रोशनी में भीगा हुवा,
एक कटोरी दूध,
शरद पुनम की रात पी लूं,
सुना है उस दिन ,
चांद की रोशनी से,
अमृत बरसता है
**ऋषिकेश खोड़के "रूह"****
इक मर्ज ने सब बिगाड़ दिया।
आसरा कितनो का उजाड़ दिया ।।
भूख से बिलबिलाता था वो बच्चा।
तो खाना कचरे से जुगाड दिया।।
ज़िन्दगी की खातिर मिलों चल के,
मैराथन विजेता पछाड़ दिया।।
चलते चलते जो रुका सदा को,
वहीं सड़क किनारे गाड़ दिया ।।
जिसकी भी जहां जब थकी सांसे।
जिस्म से "रूह" को उखाड़ दिया ।।
मन की ,
फटी जेब से,
अभी-अभी गीरा और
टुट गया,
एक अहसास ,
की तुम मिलोगे कभी !
देखें थे आँखों ने
जो शबनमी,
टूट गए हैं
वो ख्वाब,
की तुम मिलोगे कभी !
तेरे मिलन की
बरखा मे भीगू,
रूठ गई है
वो आस,
की तुम मिलोगे कभी !
दरिया के उतरते पानी में
सब बहा दिया मैंने,
मन की बेचेनियाँ,
जीवन के दुख,
तमाम परेशानियां |
दरिया देखकार बोला
हँसते हुए,
पागल !
चढते पानी के साथ,
मै सब दुगना लौटाता हूं |
***ऋषिकेश खोड़के "रूह"***