Friday, April 7, 2023

गजल

हुस्न तेरा कोई शराब हो जैसे।
दीदों को आबे गुलाब हो जैसे ।।
तुफ़ किया देख कर अनदेखा।
चेहरे पे कोई हिजाब हो जैसे ।।
लफ्जों की रवानी यूं लबों से ।
की बजता कहीं रबाब हो जैसे।।
जुंबीश-ए-चश्म के माने हजार ।
हर अदा कोई किताब हो जैसे ।।
सिलसिला दिल हारने का रूह ।
क़ल्ब-ए-हज़ीं का खिताब हो जैसे ।।

***ऋषीकेश खोड़के "रूह"***

दीदों : आखों 
आब : पानी 
तुफ़ : लानत
जुंबीश-ए-चश्म : आखों की हरकत 
क़ल्ब-ए-हज़ीं : उदास ह्रदय

रूहानी

इबादतगाहों मै बैठ कर,
लोबान के खुशबूदार धुएं के बादलों के बीच,
सब कुछ आपको रूहानी लग सकता है!
या माशूक की आंखों के समंदर में,
डूब जाना बड़ा रूमानी और रूहानी हो सकता है।
मगर
कैसे ये चश्मा!
पहनाऊं मै उनको ?

की जिनको
चांद माशूका सा खूबसूरत नही 
रोटी सा लज़ीज़ मालूम होता है,

की जिनके नाक,
कचरें की बदबू से भर नही जाती,
बल्की वो उसी कचरें से 
ट्रीट निकाल लाते है।

की जिनको,
प्लेस्टेशन प्लेजर का कुछ पता नहीं,
पंचर साइकिल का निकला हुवा पहियां
डंडी से घुमाते हुवे वो अटारी का गेम हो जाते हैं।

की जिनको,
पता नही मलमल की गर्म रजाई क्या होती हैं,
बेचारे चादर के छेद,
घुटने के निचे दबा कर ,
सर्द रातों में कोशिश करते हैं की
बर्फीली हवा रुक जाए शायद।

की जिनको,
कच्ची उम्र में 
छोड़ गया कोई किसी रेड लाइट एरिया में,
और अब मजबूर हैं जिस्म के सौदों के लिए
मरते दम तक,

किस्से बहुत है,
लाखों कहानियां हैं 

क्या रूहानी है इनके लिए
शायद!
जिंदा रहना

**ऋषीकेश खोड़के "रूह"**

Sunday, April 2, 2023

अशआर

बस जिक्र तेरा ही रूहानी है मेरे लिए ।।
बाकी तो सब दुनिया फानी है मेरे लिए ।।


दूर तक जिन्दगी का सफर कर लिया है ।
लगता नही था करेंगे मगर कर लिया है ।।
और कब तक आखिर रखोगे यूं बैठा कर ।
काफ़ी है जितना हमने सबर कर लिया है ।।


मर गया तो लौट कर आऊंगा।
भूत बनकर सबको सताऊंगा।
गज़लों को मेरी दाद दे देना तुम।
वरना छाती पर चढ़ जाऊंगा ।।

इंतज़ार आखिर कितना करवाओगे।
अब क्या गंगा जल पिलाने आओगे।।
सुबह से बैठा हूं बिछा कर पलकें ।
के जब ढलेगा दिन तब तुम आओगे।।
दिल में एक छोटी सी जगह चाहता हूं।
तुम कहते हो भीड़ में कहां समाओगे।।

गम से बाहर निकलना किसको है।
तू नही तो फिर संभलना किसको है।।

अपने पास रहने दीजिए।
थोडा सा ख़ास रहने दीजिए।
वक्त हमारा भी आएगा कभी।
छोटी से आस रहने दीजिए।

**ऋषिकेश खोडके "रुह"**


Sunday, March 5, 2023

रंजिश है तो सामने से निभा

 रंजिश है तो सामने से निभा,

खंजर को मेरी पीठ ना दिखा ।।

ईमान तू रख दे बाजार में, 

देखें तो सही किस दाम बिका  ।।

कितना डरता है अल्फाजों से,

तख्त तेरा किस बात से हिला ।।

नफरत फैला तू चाहे जितनी,

हम नही देंगे बदलने फिज़ा ।।,

बयाने-रुह तो ना-फानी  है,

कर कोशिश, मिटा सके, मिटा ।।

Monday, February 27, 2023

तेरी यादों का स्वेटर

 आज फिर,

दिल की अटैची से,

नसाफत से तह किया हुआ,

तेरी यादों का स्वेटर निकाला है ।


अब भी तेरी खुशबू इसमें महकती है ।


मुझे उम्मीद है,

ऐसा एक स्वेटर,

तेरे पास भी होगा।


धूप में मत रखना, महक चली जाएगी।

जहन से तेरी तस्वीर हटाऊं कैसे

 जहन से तेरी तस्वीर हटाऊं कैसे |

सांस है तू, फिर लेना भूल जाऊं कैसे ||

मिनट में सौ बार धड़कता है लैकिन |

दिल की धड़कन तुम्हे सुनाऊं कैसे ||

कान्हा तो नही मैं पर बांसुरी तुम हो |

रख तो लूं होठों पर, बजाऊं कैसे  ||

लानत भैजो गर नजर हट जाएं।।

हुस्न पर पलकें झपकाऊं कैसे ।।

जो कहे रूह , कमबख्त कम है  ।

बयाने हुस्न को अल्फाज लाऊं कैसे ।।

***ऋषिकेष खोडके "रूह"***

Monday, January 16, 2023

अमृत

 तेरी यादों से

महकने को अनंतकाल तक,


सोचता हूं,


चांद की रोशनी में भीगा हुवा,

एक कटोरी दूध,

शरद पुनम की रात पी लूं,


सुना है उस दिन ,

चांद की रोशनी से,

अमृत बरसता है 

**ऋषिकेश खोड़के "रूह"****