Saturday, October 14, 2023

सफर कोई हो, मंज़िल तुम्ही हो।

सफर कोई हो, मंज़िल तुम्ही हो।
हर राह का , हासिल तुम्ही हो।।
दरिया हूं आखिर कहां जाऊंगा।
मेरी मौजों का साहिल तुम्ही हो।।
तफ्तीश का ढोंग क्यू करते हो।
मुमतहिन, मेरे कातिल तुम्ही हो।।
आज़मा कर देखे जाने कितने।
आखिर पाया की कामिल तुम्ही हो।।
रिश्तों की गरमी जो बनाए रखे ।
रूह इतने काबिल तुम्ही हो।।


कामिल : संपूर्ण 
मुमतहिन : जाँचने वाला

Wednesday, September 13, 2023

बदले हुए हैं मंजर

बदले हुए हैं मंजर हम ख़ामोश है।
सब आंखों में समंदर हम ख़ामोश है।।
नफ़रतें ज़हन में बसेरा कर चुकी।
देख हाथों में खंजर हम ख़ामोश है।
जंगल पर्वत नदिया बर्बाद कर चुके।
जमीं हो रही बंजर हम ख़ामोश है।।
शमशीर ली उठा जो काटे नाखून।
कर दुनियां खंडर हम ख़ामोश है।।
हालात बदलना मुश्किल भी नहीं।
पर मान के मुकद्दर हम ख़ामोश है।।

**ऋषिकेश खोडके "रुह"**

Monday, August 28, 2023

लाख कह दो तुम की ख़राब

लाख कह दो तुम की ख़राब है।
मुझे सुकूं देने वाली शराब है ।।
मसला जो उसने ,दिल था मेरा।
शायद सोचा महज़ गुलाब है ।।
क्यूं भटकता है दिले- आवारा।।
इश्क कुछ और नही सराब है।।
करो कोशिश पढ़ के देखो तो।
ज़िंदगी मेरी खुली किताब है।।
बड़े थाट से लेटा रूह कब्र में।
जन्नत का जैसे कोई नवाब है।
**ऋषिकेश खोड़के "रूह"**

Wednesday, August 23, 2023

चांद पाने की ख़्वाहिश कर के देखो।

चांद पाने की ख़्वाहिश कर के देखो।
हौसले की आज़माइश कर के देखो।।
क्या पता दिल तुमको दे ही बैठे।
एक बार फ़रमाइश कर के देखो।।
कोई कीमत नही है जज्बातों की ।
चाहो तो कभी नुमाइश कर के देखो।।
दो गज जमीं भी अब कहां हासिल है।
कब्रिस्ता की पैमाइश कर के देखो।।
वो चांद पर जमीं ढूंढते हैं रूह ।।
तुम भी ज़रा सिफ़ारिश कर के देखो।।

ज़िंदगी अपनी ख़ाक करते रहे।

ज़िंदगी अपनी ख़ाक करते रहे।
तजुर्बात हम लाख करते रहे।।
आगे बढ़ने की चाहत थी उनको
किस किस को वो बाप करते रहे।
अब बैठे हैं आपके सामने तो
आप के नाम का जाप करते रहे
वादों करके भुला भी दिया तुमने
मुरीद गरेबाँ चाक करते रहे।।
झुलसने से जब लगे जज़्बात।
रूह शायरी को आब करते रहे।।

मुझमें कुछ तेरे जैसा रहता है।

मुझमें कुछ तेरे जैसा रहता है।
मैं तेरी धड़कन हूं ये कहता है।।
अश्क नही है ये तो बस पानी है।
एक समंदर आंखों से बहता है।।
मुझ से मत पूछिए हिज्र के माने।
बरसों से यही तो दिल सहता है।।
झूठे ही सही हमको तुम पुकारों तो।
कहां कोई आसमान यूं ढहता है ।।
"रूह" के जैसे है कोई मस्त मलंग।
बस अपनी ही धुन में रहता है ।।

फासिला दरमियान इतना तो न था

फासिला दरमियान इतना तो न था।
सोचा था तूने जितना उतना तो न था ।।
जानते हो नज़र उठेगी तो ज़रूर।
फिर मेरे ही सामने रुकना तो न था।।
नशा हुस्न का खुद मालूम है तुमको  ।
बज्म में फिर तुम्हे दिखना तो न था ।।
गुजर गया मैं, तुझे खबर भी नहीं।
खुद की मुहब्बत में चितना तो न था।।
खुद को वो रूह खुदा समझ बैठेंगे।
इस तरहा सामने झुकना तो न था ।।