Monday, August 28, 2023

लाख कह दो तुम की ख़राब

लाख कह दो तुम की ख़राब है।
मुझे सुकूं देने वाली शराब है ।।
मसला जो उसने ,दिल था मेरा।
शायद सोचा महज़ गुलाब है ।।
क्यूं भटकता है दिले- आवारा।।
इश्क कुछ और नही सराब है।।
करो कोशिश पढ़ के देखो तो।
ज़िंदगी मेरी खुली किताब है।।
बड़े थाट से लेटा रूह कब्र में।
जन्नत का जैसे कोई नवाब है।
**ऋषिकेश खोड़के "रूह"**

Wednesday, August 23, 2023

चांद पाने की ख़्वाहिश कर के देखो।

चांद पाने की ख़्वाहिश कर के देखो।
हौसले की आज़माइश कर के देखो।।
क्या पता दिल तुमको दे ही बैठे।
एक बार फ़रमाइश कर के देखो।।
कोई कीमत नही है जज्बातों की ।
चाहो तो कभी नुमाइश कर के देखो।।
दो गज जमीं भी अब कहां हासिल है।
कब्रिस्ता की पैमाइश कर के देखो।।
वो चांद पर जमीं ढूंढते हैं रूह ।।
तुम भी ज़रा सिफ़ारिश कर के देखो।।

ज़िंदगी अपनी ख़ाक करते रहे।

ज़िंदगी अपनी ख़ाक करते रहे।
तजुर्बात हम लाख करते रहे।।
आगे बढ़ने की चाहत थी उनको
किस किस को वो बाप करते रहे।
अब बैठे हैं आपके सामने तो
आप के नाम का जाप करते रहे
वादों करके भुला भी दिया तुमने
मुरीद गरेबाँ चाक करते रहे।।
झुलसने से जब लगे जज़्बात।
रूह शायरी को आब करते रहे।।

मुझमें कुछ तेरे जैसा रहता है।

मुझमें कुछ तेरे जैसा रहता है।
मैं तेरी धड़कन हूं ये कहता है।।
अश्क नही है ये तो बस पानी है।
एक समंदर आंखों से बहता है।।
मुझ से मत पूछिए हिज्र के माने।
बरसों से यही तो दिल सहता है।।
झूठे ही सही हमको तुम पुकारों तो।
कहां कोई आसमान यूं ढहता है ।।
"रूह" के जैसे है कोई मस्त मलंग।
बस अपनी ही धुन में रहता है ।।

फासिला दरमियान इतना तो न था

फासिला दरमियान इतना तो न था।
सोचा था तूने जितना उतना तो न था ।।
जानते हो नज़र उठेगी तो ज़रूर।
फिर मेरे ही सामने रुकना तो न था।।
नशा हुस्न का खुद मालूम है तुमको  ।
बज्म में फिर तुम्हे दिखना तो न था ।।
गुजर गया मैं, तुझे खबर भी नहीं।
खुद की मुहब्बत में चितना तो न था।।
खुद को वो रूह खुदा समझ बैठेंगे।
इस तरहा सामने झुकना तो न था ।।

Friday, July 14, 2023

हमारी नदियां मर रहीं हैं।

हमारी नदियां मर रहीं हैं।
देखता हूं की पानी की जगह,
हमारे ही मल मूत्र से भर रहीं है।

दो पीढ़ी पुराने जो बचे हैं लोग,
कहते हैं कि,
हम कभी नहाते थे इन नदियों में,
प्यास भी इसी पानी से बुझा लेते थे।
पास के गांव की महिलाए,
घड़ों में भर के ले जाती थी पानी।
मछुआरे जाल डाल कर,
कतला, रोहू, सिंघाल पकड़ा करते थे,
झींगा, केकड़ा
तो बच्चे भी पकड़ ले जाया करते थे अक्सर।

एक दादाजी कहते हैं,
नाव में कई बार आते थे वो दादी के साथ,
और घंटो नाव पर सिंघाड़े खाते हुवे बिताते थे,
रोमांटिक डेट कह लो आज के हिसाब से।

पिछली पीढ़ी वाले भी कहते हैं,
कुछ साल तो वो भी नदी मैं खेलें है,

फिर क्या हूवा पता नही,
अचानक आधुनिकता की बयार चली,
कंक्रीट के जंगल बढ़ते चले गए,
और भूख इतनी बढ़ी की,
की हम नदियों के किनारे भी खा गए,
नदी में उतरने वाली,
नालों, झरनों की पगडंडियों खो गई !
बदले में हमने ड्रेनेज पाइप उतार दिए,
नदी की छाती पर।

और अब !

अब 
हमारी नदियां मर रहीं हैं।
देखता हूं की पानी की जगह,
हमारे ही मल मूत्र से भर रहीं है,
इंसानों के क्या ही कहने,
मछलियां भी अब,
अपनी ही नदी में
उतरने से डर रही है।

हमारी नदियां मर रहीं हैं।





Friday, July 7, 2023

ग़ज़ल

बातों में तेरी जायका हरबार अलग है।
कुछ तो बात है तुझमें जो यार अलग है।।
जख्म नही होता लेकिन दिल में चुभते हैं।
ज़ालिम ये तेरी आंखों के औजार अलग हैं ।।
रहने दे चरागर के दवा काम की नहीं ।
ये मर्ज अलग है, तेरा बीमार अलग है।
झूठे तेरे वादें है सारे हम को है मालूम।।
कह तू चाहे जितना की इस बार अलग है।।
मौसम बहारों का रूह आता है जाता है।
तू साथ है तो अब की ये बहार अलग है।।